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लंबी अंतरिक्ष यात्रा का मस्तिष्क पर बुरा असर

वाशिंगटन. अंतरिक्ष का वातावरण मानव शरीर के लिए काफी मुश्किल होता है. लंबे समय तक माइक्रोग्रैविटी के हालात दिमाग पर बुरा असर डालते हैं. नासा की ओर से अंतरिक्षयात्रियों पर किए गए शोध में यह जानकारी सामने आई है.

अध्ययन में बताया गया है कि अंतरिक्ष में यात्रियों के दिमाग के ऊतकों का आकार सिकुड़ने से उनकी सोचने-समझने की क्षमता पर असर पड़ता है. इसके साथ ही उन्हें चलने-फिरने में परेशानी होती है. इस अध्ययन के नतीजों को ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ पत्रिका में प्रकाशित किया गया है.

नासा की ओर से बताया गया कि अध्ययन में 30 अंतरिक्ष यात्रियों को शामिल किया गया. इसमें अमेरिका, कनाडा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी के 23 पुरुष और सात महिला अंतरिक्ष यात्री शामिल थे. इनमें से आठ ने करीब दो हफ्ते तक अंतरिक्ष की यात्रा की, जबकि 18 ने छह महीने तक और चार ने एक साल का समय अंतरिक्ष में बिताया.विशेषज्ञों ने अंतरिक्ष यात्रियों का मस्तिष्क स्कैन किया. इसके आधार पर कहा कि जो अंतरिक्ष यात्री छह महीने से ज्यादा समय अंतरिक्ष पर रहे हैं, उनके मस्तिष्क के बीच के हिस्से में फैलाव पाया गया, जिससे ऊतकें सिकुड़ गई.

धरती पर वापसी के बाद बदलाव खतरनाक

शोधकर्ता राखाएल साइडलर ने बताया कि गुरुत्वाकर्षण ना होने से दिमाग में बदलाव होते हैं. इसके चलते ही दिमाग से रीढ़ की हड्डी की ओर जाने वाला द्रव सिर की ओर जाता हैऔर दिमाग ऊपर की ओर खिसक जाएगा. धरती में लौटने पर भी इस द्रव के प्रवाह का असर दिखता है जिससे यात्रियों को चलने-फिरने में परेशानी होती है.

दो अंतरिक्ष यात्राओं के बीच तीन साल का अंतर जरूरी

छह महीने या उससे ज्यादा समय तक अंतरिक्ष में रहने वाले यात्रियों के दिमाग में बदलाव देखा गया. मैक्ग्रॉगर कहती हैं कि अध्ययन में उन्होंने पाया कि ऐसी यात्राओं के बाद सामान्य होने के लिए वेंट्रिकल को तीन साल तक का वक्त लगा. इस आधार पर सलाह दी है कि अंतरिक्ष यात्राओं के बीच कम से कम तीन साल का अंतर होना चाहिए.

दिमाग में होते हैं ये बदलाव

शोकर्तओं ने बताया कि अंतरिक्ष में दिमाग के जिस हिस्से में फैलाव होता है, उसे सेरिब्रल वेंट्रिकल्स कहते हैं और यह मस्तिष्क के बीचोबीच स्थित होता है. इसी में वह द्रव जमा होता है जो मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के बीच आता-जाता है. यह द्रव मस्तिष्क के लिए तकिये जैसा काम करता है और झटका लगने पर उसे सुरक्षा देता है. हालांकि फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी में न्यूरोसाइंटिस्ट और मुख्य शोधकर्ता हेदर मैक्ग्रॉगर कहती हैं कि अगर वेंट्रिकल्स को सामान्य स्थिति में लौटने के लिए समुचित समय ना मिले तो इससे मस्तिष्क की क्षमता पर असर पड़ सकता है.

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