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यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं और वन्य जीवन को उनके प्राकृतिक आवास में देखना चाहते हैं, तो झालाना लेपर्ड रिजर्व आपके लिए एक अच्छी ट्रिप

वैसे तो चिड़ियाघर के पिंजरे में बंद और दुबके हुए लेपर्ड यानी तेंदुए को आपने कई बार देखा होगा. लेकिन अगर असल में तेंदुए की ताकत और उसकी क्षमता को देखना हो, तो झालाना लेपर्ड सफारी से बेहतर भारत में और कोई जगह नहीं होगी. राजस्थान में राजा-महाराजाओं की हवेलियां ही मुख्य रूप से पर्यटन का केंद्र हैं, लेकिन इनसे इतर वहां के अभयारण्य और सफारी पार्क भी कुछ अलग कहानी बयां करते हैं. खासकर केवल तेंदुओं के लिए बनाए गए झालाना लेपर्ड सफारी को देखकर तो ऐसा ही लगता है.

हालांकि मैं गई तो थी राजस्थान के ऐतिहासिक महलों और किलों को देखने, लेकिन झालाना का अनुभव काफी रोमांचक था. लगभग 23 किलोमीटर के इस क्षेत्र में करीब 45 तेंदुए हैं और वह भी खुले अभयारण्य में. शुरू में हमें डर लगा कि कहीं तेंदुआ पेड़ पर चढ़ हम पर हमला न कर दे. लेकिन ऐसा होता नहीं है. यह बेहद शर्मीला प्राणी जंगल में उन्मुक्त विचरण करता है और इंसानों से दूर ही रहना पसंद करता है. यहां मौजूद तेंदुओं को अलग-अलग नाम भी दिया गया है, जैसे एक मादा तेंदुआ आरती है, तो दूसरा नर तेंदुआ राणा. इसी तरह फ्लोरा मछली, नथवाली, मिसेज खान और रोमियो-जूलियट नाम के तेंदुए भी यही रहते हैं. इस पार्क को तीन जोन में बांटा गया है और जिस जोन में लेपर्ड की मौजूदगी की खबर मिलती है, तुरंत वहां से आपकी जिप्सी के चालक को कॉल आ जाएगी और वह आपको उस दिशा में लेकर चला जाएगा. हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ और जब हमने एक पेड़ पर बैठे तेंदुए को देखा, मन रोमांचित हो उठा. इसके बाद और दूसरे तेंदुए की तलाश में हम घूमते रहे, परंतु उनकी थोड़ी झलक ही देखने को मिली. वैसे तो हम सोचकर गए थे कि तेंदुए को शिकार पकड़ते देखेंगे, लेकिन ऐसा हो न सका.

और भी हैं कई पशु-पक्षी

अगर आपको लगता हैकि यहां केवल तेंदुए ही होंगे, तो ऐसा नहीं है. तेंदुए के साथ-साथ यहां दूसरे कई छोटे-बड़े जीव-जंतु भी देखने को मिलते हैं. जैसे यहां धारीदार लकड़बग्घे को भी देखा जा सकता है. हालांकि हमारी जिप्सी देखकर वह जंगल में कहीं गुम हो गया था. इसके अलावा आपको यहां कस्तूरी बिलाव, रेगिस्तानी लोमड़ी, सियार, साही, सांभर, चीतल, नीलगाय और पक्षियों की कई प्रजातियां भी देखने को मिल सकती हैं, जैसे एशियन पैराडाइज फ्लाईकैचर, ग्रे फ्रैंकोलिन्स, गोल्डन ओरिओल, इंडियन पिट्टा, डस्की ईगल, उल्लू आदि. अगर आपको बर्ड फोटोग्राफी पसंद है, तो आप यहां फोटोग्राफी भी कर सकते हैं. जिप्सी से आगे बढ़ते हुए जब हरी घास खाती नीलगाय और ढेर सारे मोर एक साथ दिखाई दिए, तभी हम समझ गए थे कि हमारा यहां आने का निर्णय सही था. दो-तीन घंटे की हमारी यात्रा अच्छी रही और फिर कभी-कभार घास की झाड़ियों में उछलते हिरण भी अनायास ही आपको रुकने पर मजबूर कर देते हैं. अगर आप यहां जाने की योजना बना रहे हैं, तो यहां अपने साथ कैमरा ले जाना न भूलिएगा, क्योंकि वहां ऐसे कई यादगार लम्हें आपको मिल सकते हैं, जिन्हें आप अपने कैमरे में कैद करना चाहे.

कब जाएं, कैसे जाएं

वैसे तो सालों भर खुला रहने के कारण झालाना के लिए किसी समय का चुनाव करना मुश्किल नहीं होता. गर्मी के मौसम में सुबह 5.45 बजे से 8.15 बजे तक और शाम 4.45 बजे से 7.15 बजे तक सैर कराई जाती है. जबकि सर्दियों में सुबह 6.15 से 8.45 बजे तक और दोपहर 3.30 बजे से शाम 6.15 बजे तक यह सुविधा उपलब्ध होती है. सफारी में जाने के लिए कम से कम 3-4 घंटों का समय जरूर रखें और गाइड द्वारा बताए गए दिशा-निर्देशों का पालन भी करें. अगर आप किसी अन्य राज्य से आ रहे हैं, तो यहां का निकटतम एयरपोर्ट सांगानेर हवाई अड्डा है, जो करीब पांच किलोमीटर दूरी पर है. यहां का निकटतम रेलवे स्टेशन मेड़ता रोड जंक्शन है, जो झालाना सफारी पार्क से 10 किलोमीटर की दूरी पर है. जहां तक बात ठहरने की है, तो जयपुर में आपको बजट वाले काफी अच्छे होटल मिल जाएंगे. जयपुर से झालाना जाना आपके लिए ज्यादा आसान रहेगा. और फिर आप जयपुर भी घूम सकते हैं.

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