Akanksha satyavanshi cricketer: रायपुर. ‘हर खिलाड़ी के शरीर का हिसाब मुझे पता था- कब उसे कितनी रोटी, कितना चावल, कब सोना और कब उठना है।’ यह कहना है रायपुर की आकांक्षा सत्यवंशी का, जो हाल ही में वर्ल्ड चैंपियन बनी भारतीय महिला क्रिकेट टीम की मुख्य फिजियो हैं। आकांक्षा के अनुसार, यह जीत मैदान पर जितनी शानदार थी, उतनी ही पसीने और अनुशासन से भरी हुई तैयारी मैदान के बाहर भी चली। ‘दो साल की निरंतर मेहनत, बारीकी से की गई फिजिकल ट्रेनिंग और सटीक डाइट चार्ट ने ही इस टीम को दुनिया की नंबर-वन बनाया,’ उन्होंने मुस्कराते हुए कहा। स्टेडियम में 50 हजार से ज्यादा दर्शक, 120 से 150 डेसिबल तक का शोर और पूरे 50 ओवर तक मैदान में टिके रहना- यह सब आसान नहीं था।

आकांक्षा बताती हैं, ‘यह सिर्फ फिटनेस नहीं, मानसिक मजबूती की भी परीक्षा थी। हर खिलाड़ी को अपनी सीमा से आगे जाकर खेलना था। इस दौरान हमारी जिम्मेदारी थी कि किसी का शरीर टूटे नहीं, मन डगमगाए नहीं।’
‘ऑस्ट्रेलिया’ था टारगेट (akanksha satyavanshi cricketer)
आकांक्षा ने बताया कि वर्ल्ड कप की असली तैयारी एशिया कप के बाद ही शुरू हो गई थी। ‘हमारा लक्ष्य साफ था ऑस्ट्रेलियन टीम से बेहतर बनना। उनके फिटनेस मॉडल को आधार बनाकर हमने काम किया।’ वाइजैक और बेंगलुरू कैंप में खिलाड़ियों के बॉडी मैकेनिज्म के आधार पर सटीक शिड्यूल तैयार किया गया। ‘किस खिलाड़ी को कब और कितनी रोटी-चावल लेना है, यह तक दर्ज किया गया था। सोने और उठने के समय का भी डेटा ट्रैक होता था। इस पूरी प्रक्रिया में स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोच ए. आई. हर्षा की अहम भूमिका रही,’ आकांक्षा ने बताया। यहां तक कि सालभर के मासिक धर्म की तारीखों का भी हिसाब रखा गया। ताकि मैच के दौरान कोई चुनौती ना आए।
शरीर के हिसाब से तय हुआ हर शिड्यूल
हर खिलाड़ी के शरीर की संरचना, बैटिंग ऑर्डर और खेल के स्टाइल के अनुसार ट्रेनिंग बदली गई। ओपनर और मिडिल ऑर्डर बैटर के फोरआर्म्स और शोल्डर की ताकत मापी गई। वहीं, बॉलर्स की कलाई, उंगलियों और थाई मसल्स की मजबूती का आकलन नेशनल क्रिकेट एकेडमी में किया गया। ‘हम जानते थे कि फाइनल तक पहुंचने के लिए शरीर का हर हिस्सा उतना ही मजबूत होना चाहिए जितना खिलाड़ी का हौसला,’ उन्होंने कहा।
छत्तीसगढ़ में टैलेंट है, बस एक्सपोजर की कमी
आकांक्षा कहती हैं, ‘छत्तीसगढ़ में टैलेंट की कोई कमी नहीं है, कमी है सिर्फ एक्सपोजर की। यहां के खिलाड़ी भी वर्ल्ड लेवल तक जा सकते हैं, अगर उन्हें सही मार्गदर्शन और सुविधाएं मिलें।’ वो कहती हैं, ‘स्पोर्ट्स फिजियोथैरेपी केवल इलाज नहीं, बल्कि हर खिलाड़ी की सफलता की रीढ़ होती है। मैंने एमबीबीएस नहीं किया, लेकिन आज फिजियोथैरेपी के जरिए देश का नाम रोशन किया। इसलिए युवा निराश न हों, चिकित्सा क्षेत्र में और भी मंजिलें हैं।’
स्पोर्ट्स फिजियो की भूमिका
- खिलाड़ी के बायोमैकेनिक्स, शक्ति और लचीलेपन का आकलन कर जोखिम की पहचान।
- लक्षित अभ्यास से चोटों की संभावना को कम करना।
- मैच के दौरान लगी चोट के बाद त्वरित उपचार और वापसी की योजना।
- खिलाड़ियों की ताकत, चपलता और सहनशक्ति बढ़ाने की विशेष ट्रेनिंग।
- आहार और रिकवरी रणनीतियों पर निगरानी ताकि हर खिलाड़ी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सके।



















