छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि शादीशुदा जीवन में पति-पत्नी के बीच होने वाली सामान्य नोकझोंक, मतभेद या छोटी-मोटी कहासुनी को मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल ऐसे कारणों के आधार पर तलाक की अनुमति नहीं दी जा सकती। मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि वैवाहिक जीवन में विचारों का मतभेद और सामान्य विवाद स्वाभाविक हैं। इन्हें मानसिक उत्पीड़न या क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, जब तक कि उनके समर्थन में गंभीर और ठोस परिस्थितियां सामने न हों।
इसी टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट ने पति द्वारा दायर तलाक की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने माना कि प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर मानसिक क्रूरता का आरोप सिद्ध नहीं होता और इसलिए विवाह विच्छेद का पर्याप्त आधार नहीं बनता।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल मामला रायपुर निवासी एक दंपत्ति से जुड़ा हुआ है. दोनों ने परिवार की सहमति के बाद 6 दिसंबर 2014 को शादी रचाई थी. दोनों के दो बच्चे भी है. हालांकि धीरे-धीरे समय बीतने के साथ-साथ परिवारिक कलह भी बढ़ता गया. जिसके चलते पत्नी अपने दोनों बच्चों को लेकर मायके चली गई. इसके बाद पति ने पत्नी पर मानसिक क्रूरता और परित्याग का आरोप लगाते हुए परिवार न्यायालय में तलाक की अर्जी दाखिल की.
पति ने लगाए पत्नी पर आरोप
पति ने अपनी पत्नी पर आरोप लगाया कि पत्नि अपने ननदों के साथ रहना नहीं चाहती और न ही वो ये चाहती है कि ननदें उसके बेटे को छुएं. पत्नी का व्यवहार ससुराल के रिश्तेदारों के प्रति क्रूरतापूर्ण हैं और पत्नी द्वारा आत्महत्या करने की धमकियां दी जाती हैं. फैमली कोर्ट ने पति इस याचिका को साक्ष्यों के अभाव में खारीज कर दिया. जिसके बाद पति ने हाई कोर्ट में अपील की.
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
हाई कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने साक्ष्यों की सही समीक्षा की है. अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल एक जीवनसाथी का दूसरे के व्यवहार से नाखुश होना या स्वभाव मेल न खाना अपने आप में ऐसा आधार नहीं है जिसके लिए विवाह को भंग करने का आदेश दिया जाए.


















