भाद्रपद मास की अंधेरी और वर्षा वाली रात में कंस के कारागार में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कान्हा का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। जन्माष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। धार्मिक ग्रंथों में श्रीहरि के उत्सवों को प्रेम और हर्षोल्लास के साथ मनाने का महत्व बताया गया है।
जन्माष्टमी पर क्या करें?
जन्माष्टमी के दिन सुबह स्नान करने के बाद पीले वस्त्र धारण करने की परंपरा है। इसके बाद घर के मंदिर की अच्छी तरह साफ-सफाई करें और गंगाजल का छिड़काव कर पूजा स्थल को पवित्र करें। मंदिर को रंग-बिरंगे फूलों से सजाया जा सकता है। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराकर विधि-विधान से पूजा करें। रात में भगवान के जन्म के समय विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। जन्माष्टमी की रात्रि पूजा में खीरा रखने की भी धार्मिक परंपरा बताई जाती है। मान्यता के अनुसार, इसे भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव से जोड़कर देखा जाता है।
जन्माष्टमी की रात कान्हा जी के जन्म पर खीरा काटने की परंपरा है, इसे गर्भनाल से जोड़कर देखा जाता है। इसके लिए भगवान कृष्ण के जन्म के समय खीरा काटकर उसके बीज निकाले जाते हैं, इसे नाभि छेदन क हाजाता है। खीरे का डंठल गर्भनाल माना जाता है, कहा जाता है कि भगवान कृष्ण को माता देवकी के गर्भ से अलग करने क्रिया की जाती है,ऐसे में खीरा और डंठल प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि जब कल्कि अवतार होगा, तो सभी के घर में रखा खीरा अपने आप फट जाएगा।
कब है जन्माष्टमी पर्व
हृषिकेश पंचांग के अनुसार इस साल जन्माष्टमी का पर्व महापुण्यदायक योग के साथ हर्षण योग में मनाया जाएगा। उदया तिथि में अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र होने से सभी के लिए कृष्ण जन्माष्टमी एक ही दिन रहेगा। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में एक दिन पहले अर्द्ध रात्रि को अष्टमी तिथि होने से कृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं। इस साल दोनों का व्रतार्चन एक ही दिन 4 सितंबर को रहेगा। आपको बता दें कि इस साल अष्टमी तिथि शुक्रवार को सूर्योदय 5: 46 बजे और भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि का मान रात को 11:13 बजे तक रहेगा।
जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र कब रहेगा?
इस साल रोहिणी नक्षत्र सम्पूर्ण दिन और रात को 11:12 मिनट तक बना रहेगा, इसलिए 4 सितंबर को पूजा करना शुभ रहेगा। भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी बुधवार को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। अष्टमी के उपवास से पूजन और नवमी के तिथि मात्र के स्पर्श से व्रत की पूर्ति होती है। उदयकालीन अष्टमी तिथि एवं रोहिणी नक्षत्र का संयोग इसी दिन प्राप्त हो रहा है। इसे जयंती योग भी कहते हैं। बहुत समय के बाद ऐसा शुभ योग बन रहा है। गृहस्थ और वैष्णव दोनों चार सितंबर को ही व्रत रहेंगे।
















