जगदलपुर। गरीबों को पक्का मकान उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संचालित प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) एक बार फिर सवालों के घेरे में है। बस्तर संभाग मुख्यालय जगदलपुर में योजना के तहत आवेदन और आवंटन के आंकड़ों को लेकर नगर निगम और विपक्ष के बीच विवाद गहरा गया है। एक ओर नगर निगम योजना के सफल क्रियान्वयन का दावा कर रहा है, वहीं विपक्ष का आरोप है कि बड़ी संख्या में पात्र लोगों के आवेदन विभिन्न कारणों से खारिज या लंबित कर दिए गए, जिससे कई जरूरतमंद परिवार आज भी अपने घर के इंतजार में हैं।
आंकड़ों को लेकर आमने-सामने सत्ता और विपक्ष
नगर निगम के अनुसार, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 2,036 आवेदन स्वीकृत किए गए हैं। इनमें से 1,855 मकानों का निर्माण कार्य शुरू हो चुका है। निगम का दावा है कि योजना तय प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ रही है और पात्र हितग्राहियों को चरणबद्ध तरीके से लाभ दिया जा रहा है। वहीं विपक्ष इन आंकड़ों पर सवाल उठा रहा है। विपक्ष का कहना है कि योजना के लिए करीब 1,600 आवेदन प्राप्त हुए थे, लेकिन इनमें से लगभग 1,200 आवेदन दस्तावेजों की कमी या अन्य कारणों से रिजेक्ट अथवा होल्ड कर दिए गए। विपक्ष का आरोप है कि जटिल प्रक्रिया और दस्तावेजी शर्तों के कारण बड़ी संख्या में गरीब परिवार योजना के लाभ से वंचित रह गए।
दस्तावेज बने सबसे बड़ी चुनौती
योजना का लाभ लेने के लिए आवेदकों को कई अनिवार्य दस्तावेज प्रस्तुत करने होते हैं। इनमें अगस्त 2015 से पहले का स्थानीय निवास, मतदाता पहचान पत्र, स्थानीय निवास प्रमाण पत्र, जनगणना सूची में नाम, तथा वार्षिक आय तीन लाख रुपये से कम होने का प्रमाण शामिल है। इन शर्तों के कारण कई ऐसे परिवार, जो वास्तव में आवास के पात्र हैं, दस्तावेज पूरे नहीं कर पाने की वजह से आवेदन प्रक्रिया में ही बाहर हो गए। स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या इतनी सख्त दस्तावेजी प्रक्रिया पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है या फिर यही गरीबों के लिए सबसे बड़ी बाधा बन गई है।
तैयार मकानों का भी नहीं हो सका पूरा आवंटन
नगर निगम के आंकड़ों के अनुसार अब तक 346 मकानों का निर्माण पूरा हो चुका है। इनमें से 303 मकान हितग्राहियों को आवंटित किए जा चुके हैं, जबकि 116 मकानों का निर्माण कार्य अभी जारी है। इसके बावजूद धरमपुरा और देवकी क्षेत्र में कई मकान तैयार होने के बाद भी पात्र परिवार अंतिम सूची और आवंटन का इंतजार कर रहे हैं। इससे योजना के क्रियान्वयन की गति पर भी सवाल उठ रहे हैं।
आर्थिक बोझ भी बना चुनौती
योजना के तहत लाभार्थियों को कुल लागत का लगभग 10 प्रतिशत अंशदान, यानी करीब 38 हजार रुपये, स्वयं जमा करना होता है। सब्सिडी मिलने के बावजूद एक मकान की कुल लागत करीब 3 लाख रुपये तक पहुंच रही है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह राशि जुटाना भी आसान नहीं है, जिससे कई पात्र हितग्राही योजना का लाभ लेने से पीछे हट रहे हैं।
जवाबदेही पर उठ रहे सवाल
नगर निगम जहां योजना के प्रभावी संचालन का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया अभी भी जारी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि बड़ी संख्या में आवेदनों के निरस्त होने या लंबित रहने के लिए जिम्मेदार कौन है। स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यदि पात्र परिवार दस्तावेजी कारणों से योजना से बाहर हो रहे हैं, तो प्रशासन को उनकी मदद के लिए विशेष अभियान चलाना चाहिए। अब नजर इस बात पर है कि नगर निगम और प्रशासन लंबित मामलों का समाधान कितनी तेजी से करते हैं और वर्षों से अपने पक्के घर का सपना देख रहे बेघर परिवारों को आखिर कब तक योजना का वास्तविक लाभ मिल पाता है।


















