नई दिल्ली। देश में आम लोगों के लिए राहत भरी खबर है। आने वाले समय में दवाइयों की कीमतों में कमी आ सकती है। दवा उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल, यानी एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स की कीमतों में हाल के महीनों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है, जिसका सीधा असर दवाओं की कीमतों पर पड़ सकता है।
भारत में दवा उद्योग का एक बड़ा हिस्सा चीन से आयात किए जाने वाले एपीआई पर निर्भर है। अनुमान के अनुसार, भारत अपनी लगभग 70 प्रतिशत एपीआई की जरूरतें चीन से पूरी करता है। कोविड-19 महामारी के दौरान इस कच्चे माल की कीमतें काफी बढ़ गई थीं, जिससे दवाइयां महंगी हो गई थीं। हालांकि अब स्थिति बदलती नजर आ रही है। खबरों के मुताबिक, चीन में एपीआई की कीमतों में 35 से 40 प्रतिशत तक की गिरावट आई है। उदाहरण के तौर पर, पैरासिटामोल का एपीआई जो महामारी के समय करीब 900 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया था, अब घटकर लगभग 250 रुपये प्रति किलो हो गया है। इसी तरह, एमोक्सिसिलिन और क्लैवुलानेट जैसे एंटीबायोटिक दवाओं के कच्चे माल की कीमतों में भी काफी कमी आई है।
दाम न घटे तो सरकार कर सकती है हस्तक्षेप
सरकार भी इस पूरे मामले पर नजर बनाए हुए है। नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी आवश्यक दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करती है और जरूरत पड़ने पर अधिकतम खुदरा मूल्य में बदलाव कर सकती है। यदि कच्चे माल की कीमतें लंबे समय तक कम रहती हैं, तो सरकार दवाओं की कीमतों में कटौती का फैसला ले सकती है। आने वाले महीनों में आम मरीजों को सस्ती दवाइयों का लाभ मिल सकता है।
जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता से हो रहा घाटा
दवा उद्योग के जानकारों का कहना है कि चीन में कोविड के बाद जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता विकसित हो गई थी, जिसके चलते अब एपीआई की आपूर्ति अधिक और मांग कम हो गई है। इसी वजह से कीमतों में गिरावट देखी जा रही है। यदि यह स्थिति बनी रहती है, तो भारतीय दवा कंपनियों की उत्पादन लागत घटेगी और इसका फायदा उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि दवाइयों की कीमतें तुरंत कम नहीं होंगी। कंपनियां आमतौर पर पुराने स्टॉक खत्म होने के बाद ही नई कीमतों का असर दिखाती हैं। इसके अलावा, कुछ भारतीय एपीआई निर्माता



















