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अरावली में खनन भविष्य के लिए खतरनाक

अगर अरावली ढाई तो सिर्फ पहाड़ ही नहीं ढहेंगे, पानी, खेती, हवा और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी खतरे में पड़ जायेगा। यह विकास नहीं, चेतावनी है कि अब भी नहीं संभले तो बहुत देर हो जायेगी।

लेख: ज्ञानेन्द्र रावत

सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की परिभाषा और सहायक मुद्दों के संबंध में बीते दिवस स्वत संज्ञान लेते हुए अभी फिलहाल अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की नयी परिभाषा स्वीकार करने वाले अपने 20 नवम्बर के आदेश पर रोक लगा दी है और अपने आदेश में कहा है कि पिछले फैसले में निर्धारित निष्कर्षों और निर्देशों को स्थगित रखने की जरूरत है, क्योंकि कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिनपर स्पष्टीकरण की जरूरत है। शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे की व्यापक और समग्र समीक्षा के लिए इस क्षेत्र के विशेषज्ञों को शामिल कर एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि क्या अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की परिभाषा, जो विशेषकर दो या दो से अधिक पहाड़ियों के बीच 500 मीटर के क्षेत्र तक सीमित है, एक संरचनात्मक विरोधाभास पैदा करती है, इससे संरक्षित क्षेत्र का भौगौलिक दायरा संकुचित हो जाता है।

अनियमित खनन

इस सीमांकन में गैर अरावली क्षेत्रों के दायरे को विस्तृत कर दिया है, जिसके चलते अनियमित खनन और अन्य विघटनकारी गतिविधियों को जारी रखने में सुविधा हो रही है, क्या 100 मीटर और उससे ऊंची पहाड़ियां निर्धारित 500 मीटर की सीमा से अधिक की दूरी होने पर भी एक सन्निहित पारिस्थितिकीय संरचना का गठन करती हैं। व्यापक रूप से प्रचारित आलोचना कि राजस्थान की 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1048 पहाड़ियां ही 100 मीटर की ऊंचाई की सीमा को पूरा करती हैं, जिससे शेष निचली पहाड़ियों को पर्यावरण संरक्षण से वंचित कर दिया जा रहा है, क्या यह तथ्यात्मक और वैज्ञानिक रूप से सही है। शीर्ष अदालत का यह भी मानना है कि पर्यावरणविदों ने नयी परिभाषा और कोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या और अनुचित कार्यान्वयन की आशंका जताते हुए चिंता प्रकट की है।

निर्देशों में स्पष्टता

यह आशंका, आलोचना या असहमति कोर्ट के निर्देशों में स्पष्टता की कमी से उत्पन्न हुयी है। इसलिए अरावली क्षेत्र की पारिस्थितिकीय अखंडता को कमजोर करने वाली किसी भी नियामकीय खामी को रोकने के लिए जांच और स्पष्टीकरण की बेहद जरूरत है। जाहिर है सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश स्वागत योग्य है। आगे क्या होगा लेकिन इतना तय है कि इसने 20 नवम्बर के आदेश से उपजे असंतोष और विरोधियों के स्वरों को राहत पहुंचाने का काम किया है। असलियत में देश के पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस नयी परिभाषा का कड़ा विरोध करते हुए आशंका जताई थी कि इससे पहाड़ियों में खनन, रियल स्टेट और अन्य परियोजनाओं के लिए रास्ता खोलकर उन्हें नुकसान पहुंचाने की एक सुनियोजित साजिश की जा रही है। यह भी कि अरावली क्षेत्र में खनन बढ़ाने की सोच भविष्य के लिए खतरनाक है।

विरोध प्रदर्शन हुए

सुप्रीम कोर्ट के 20 नवम्बर के फैसले के विरोध में देश में खासकर अरावली क्षेत्र के राज्यों में व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए, जगह-जगह रैलियां हुयीं। यहां तक कि इसके विरोध में हुये प्रदर्शनों में आमजन के अलावा राजनैतिक दलों, स्कूल-कालेज के छात्रों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया है और वे बड़ी संख्या में आज भी सेव अरावली नामक अभियान बड़े जोर-शोर से चला रहे हैं। उनका मानना है कि उत्तर से पश्चिम तक फैली अरावली को तोड़ना भारत की विरासत को तोड़ने जैसा है। अगर अरावली ढाई तो सिर्फ पहाड़ ही नहीं ढहेंगे, पानी,

खेती, हवा और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी खतरे में पड़ जायेगा। यह विकास नहीं, चेतावनी है कि अब भी नहीं संभले तो बहुत देर हो जायेगी। असलियत में अरावली को लेकर जो बावेला मचा हुआ है, वह उसके अस्तित्व को लेकर है जिसपर खतरा मंडरा रहा है।

प्राकृतिक ढाल है

इसका एकमात्र कारण यह है कि अरावली मात्र हमारे लिए भूगोल का एक अध्याय नहीं है, वह पत्थरों का एक ढेर नहीं, चट्टानों की एक कतार नहीं, एक पहाड़ नहीं है, उस पर मरुधरा का पूरा अस्तित्व टिका हुआ है। वह रेगिस्तान से बचाने वाली प्राकृतिक ढाल है। वह 670 किलोमीटर क्षेत्र में फैला उत्तर भारत का सुरक्षा कवच है, जो हजारों सालों से थार रेगिस्तान को पूर्व की ओर विस्तार को रोकता है ताकि पूर्वके लोग खुली हवा में सांसले सकें। वह भूजल को संचित करती है, धूल भरी आंधियों और प्रदूषण से शहरों को बचाती है। इस क्षेत्र में 300 से भी ज्यादा पक्षी प्रजातियों के अलावा तेंदुए जैसे जंगली जानवरों का वास है। सुप्रीम कोर्ट ने भले 20 नवम्बर के फैसले को बदल कर एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाने की घोषणा की है जो इससे जुड़े मुद्दों पर गहन मंथन करेगी। इसमें दो राय नहीं कि पेड़ों की जड़ मिट्टी को बांधकर रखती हैं। उनके कटते ही मिट्टी बहने लगती है, उसकी उपजाऊ परत नष्ट हो जाती है और जमीन बंजर होने लगती है। असलियत यह है कि पेड़ों के कटते ही कार्बन सोखने की प्राकृतिक क्षमता काफी घट जाती है, नतीजा वातावरण में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा काफी बढ़ जाती है और तापमान बढ़ने लगता है। जलवायु परिवर्तन में तेजी इंसानों और जीव-जंतुओं के लिए खतरा बन जाती है।

यह लेखक के अपने विचार हैं।

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