नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को निजी स्कूलों की मनमानी फीस बढ़ोतरी पर लगाम लगाने के लिए दिल्ली सरकार द्वारा कानून बनाने में जल्दबाजी दिखाने और इसे लागू करने के तरीके पर सवाल उठाते हुए, इसे चिंताजनक बताया।
हालांकि, शीर्ष अदालत ने कहा कि कानून का मकसद जनता की भलाई है, लेकिन बनाने में दिखाई गई जल्दबाजी और पिछली तारीख से इसे लागू किए जाने की वजह से स्कूलों के लिए व्यावहारिक और वित्तीय दिक्कतें पैदा हो सकती हैं। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने निजी स्कूलों के संघ ‘एक्शन कमेटी’ की ओर से दिल्ली स्कूल शिक्षा (फीस निर्धारण और नियमन में पारदर्शिता) अधिनियम, 2025 पर रोक लगाने की मांग को लेकर दाखिल अपील पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की।

पीठ ने कहा कि वह मामले में दखल देगा। कोर्ट ने दिल्ली सरकार से फीस तय करने और उसके पिछली तारीख से लागू होने के मुद्दे पर विचार करने और स्पष्टता के साथ वापस आकर जानकारी देने को कहा है। दिल्ली सरकार ने पिछले साल दिसंबर में यह कानून बनाया और इसे लागू करने के लिए जारी सरकारी सर्कुलर को मौजूदा शैक्षणिक सत्र में लागू करने के तरीके पर चिंता जताई।
स्कूल प्रबंधनों की दलील- विधानसभा को अधिकार नहीं
इससे पहले, स्कूल प्रबंधन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने पीठ से कहा कि दिल्ली विधानसभा को इस मुद्दे पर कानून बनाने का अधिकार नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता रोहतगी ने कहा कि फीस नियमन के मुद्दे पर दिल्ली सरकार द्वारा बनाए गए कानून मनमाना और संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि दिल्ली विधानसभा को शिक्षा के मुद्दे पर कानून बनाने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि अनुच्छेद 239एए के तहत, दिल्ली विधानसभा को केवल राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर ही कानून अधिकार है और यह अधिकार स्पष्ट रूप से संसद की सर्वोच्च शक्तियों के अधीन है। उन्होंने कहा कि इस कानून को दिल्ली हाईकोर्ट के सामने चुनौती देते हुए रोक लगाने की मांग की गई थी, लेकिन कोई अंतरिम राहत नहीं दी गई।
दिल्ली सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जरनल एसवी राजू ने पीठ से कानून पर किसी तरह का रोक नहीं लगाने की आग्रह किया। मामले की सुनवाई मंगलवार को होगी।



















