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कानाफूसीः उद्धव की राह… खतरा… बीएमसी का खेल… क्रिकेट के बहाने… ट्रंप के पैंतरे

उद्धव की राह

मानी ऐसा लग रहा। महाराष्ट्र में एकनाथ शिदि उद्धव ठाकरे की राह पर। जब शिंदे 2022 में शिवसेना तोड़कर भाजपा के साथ आए। तो पहले मुख्यमंत्री बने। लेकिन जब 2024 का विधानसभा चुनाव हुआ। तो सारे समीकरण पलट गए। लेकिन शिंदे अपने पिछले दौर से नीचे सोचने को तैयार नहीं। इसीलिए 2024 के चुनाव परिणाम के बाद कई दिनों तक सीएम पद एवं शिंदे की सरकार में भागीदारी को लेकर सस्पेंस बना रहा। अब यही हाल बीएमसी के परिणाम आने के बाद बन रहा। पार्षदों का संख्या गणित साफ बता रहा। भाजपा हर मामले में आगे। इसके बावजूद शिदि अपनी हनक भूल नहीं पा रहे। अभी वह राज्य की महायुत्ति सरकार में मजबूरी में डिप्टी सीएम। अब वह बीएमसी में मेवर पद और स्थाई समिति की अगुवाई मांग रहे। तो क्या माना जाए? एकनाथ शिंदे उद्धव ठाकरे की राह पर।

खतरा

देश की राजनीति तेजी से बदल रही। राजनीति का एक दौर अवसान की ओर। तो नए नेताओं का उभार। कुछ नेता ऐसे भी। जो युवा तो कहलाते। लेकिन उनकी राजनीति को मानों ग्रहण लगने का अंदिशा। इस श्रेणी में सबसे पहले गौरव गोगोई। असम में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष। उन्हें विरासत में राजनीति मिली। लेकिन यदि इस बार भी असम में भाजपा जीती। तो गोगोई को अगली बार मौका मिलेगा। इसमें संदेह। वाहीं, तेजस्वी गादव लालू जी की विरासत संभालने को तैयार। लेकिन राजद का हालिया विधानसभा चुनाव में उम्मीद से कम प्रदर्शन। सो, अब पार्टी संगठन संभालने में लगे हुए। एक ममता बनर्जी के भांजे, अभिषेक बनर्जी। जिन पर भ्रष्टचार के गंभीर आरोप। अब यदि इस बार टीएमसी सत्ता से चाहर हुई। तो अभिषेक चनर्जी के राजनीतिक उदय पर ग्रहण लगना तय। फिर पार्टी चलाना भी मुश्किल होगा।

बीएमसी का खेल

बीएमसी आजकल चर्चा में। आखिर यहां सात साल बाद चुनाव जो हुए। यहां करीब तीन दशकों तक शिवसेना काबिज रही। लेकिन इस बार खेत रही। भाजपा ने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए सहयोगी एकनाथ शिंदे के साथ उद्धव ठाकरे की यूबीटी को बाहर का रास्ता दिखा दिया। मतलब भाजपा ने बीएमसी जीती ही नहीं। बल्कि ठाकरे ब्रांड पर आखरी कील भी ठोक दी। अब यहां से उद्धव ठाकरे कहां जाएंगे? यह देखने वाली बात। फिर बीएमसी का बजट देश के कई राज्यों से भी ज्यादा का। ऐसे में राजनीति में रूचि रखने वालों की इस पर नजर रहना स्वाभाविक। हां, कांग्रेस कुछ असर दिखा पाई। लेकिन पवार परिचार की भी पोल खुल गई। लेकिन ओवैसी की एमआईएम का जलवा देखने को मिला। लेकिन भाजपा की रणनीति के आगे सब चौने नजर आए। जबकि सीएम देवेन्द्र फड़नवीस नए नायक बनकर उभर रहे।

क्रिकेट के बहाने

क्रिकेट के बहाने रकेट के बहाने भारत और पाकिस्तान के बीच ही शह मात का खेल होता रहा। लेकिन अब इस खेल में बांगलादेश भी शामिल हो गया। बांगलादेश में अल्पसंख्यकों खासकर हिन्दुओं के खिलाफ हो रही लगातार हिंसा के विरोध में भारत में सर्वसमाज द्वारा तगड़ा रोष प्रकट किया जा रहा। पिछले दिनों आईपीएल में कोलकाता नाइट राइडर्स में शामिल किए गए बांगलादेशी खिलाड़ी को तगड़े विरोच के बाद बाहर किया गया। इससे बांगलादेश ने भी भारत में आयोजित होने वाले टी 20 विश्वकप खेलने से इनकार कर दिया। असल में, बांगलादेश मानने को ही तैयार नहीं कि खुद उसके देश में धार्मिक अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं। बल्कि उल्टा भारत को ही नसीहत दे रहा। हां, इतना तय चांगलादेश का वर्तमान निजाम भारत के खिलाफ बड़ी ताकतों का टूल बन रहा। जिससे भारत से ज्यादा बांगलादेश का ही नुकसान होगा।

ईरान का बवाल

ईरान में खासा बवाल हो गया। अब ठंडा पड़ रहा। ईरान का आरोप। यह अमरीका की शह पर। यहां की व्यवस्था चदलने के लिए। वैसे ईरान के पक्ष में रूस और चीन। वहीं, अमरीका, वेनेजुएला की ही तरह अपना पिटू ईरान में भी बैलाना चाहता। लेकिन वह हो नाहीं पा रहा। एक तो ईरान बड़ा देश। दूसरा उसकी सेना भी वेनेजुएला के मुकाबले कहीं ज्यादा संक्षम। सो, अमरीका की दाल गल नहीं रही। इसीलिए डोनाल्ड ट्रंप ढीले पड़ गए। वह ऐसा कुछ कर रहे। जिससे दुनियां की नजरें उनके एक्शन पर। इससे दुनिया अस्थिरता की ओर। हां, बात ईरान की। जिस पर कार्रवाई से मुस्लिम देश भी नाराज। क्योंकि उन्हें लग रहा कि कहीं ईरान के बाद उनकी बारी न आ जाए। खासकर ऐसे देश जहां राजपरिवार शासन कर रहे। यदि वहां की जनता भी सड़कों पर आ गई तो।

ट्रंप के पैंतरे

डोनाल्ड ट्रंप अपने पैतरों से लगातार दुनियां को चौंका रहे। जिससे अस्थिरता और डर का आलम। शेयर बाजार प्रभावित हो रहे। वैश्विक व्यवस्था भी गड़बड़ा रही। दुनियां का भू-राजनीतिक समीकरण लगातार बदल रहा। बात चाहे टैरिफ की हो या ट्रंप द्वारा कई देशों को सीधे धमकाना। ग्रीनलैंड को कब्जाने के प्रयास का यूपोपीय यूनियन द्वारा कड़ा विरोध। नाटो की एकता तक खतरे में। भारत को वह लगातार टैरिफके मामले में निशाने पर ले रहे। इससे भारत, चीन और रूस के करीब जा रहा। भारत यूरोपीय देशों से भी मेल मिलाप बढ़ा रहा। जिससे अमरीकी थिंक टैंक परेशान। वह ट्रंप को चेता रहे। एक सीमा के बाद कहीं उनकी कुर्सी खतरे में न पड़ जाए। ट्रंप अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे। इस पर भी अब संदेह जताया जा रहा। फिलहाल तो वह अपने कार्यकाल का एक साल पूरा कर चुके।

ग्लोबल हलचल

इन दिनों ग्लोवल हलचाल चढ़ रही। रूस-यूक्रेन युद्ध को चार साल पूरे होने जा रहे। तो अमरीका ने हाल ही में वेनेजुएला को कब्जा लिया। अब अमरीका ग्रीनलैंड को जबरन कब्जाने की फिराक में। चीन-ताइवान तनाव कई बार विश्व के लिए चिंता का सबब बनता राहता। पड़ोसी बांगलादेश में अमरीका और चीन की घुसपैठ बढ़ रही। नेपाल में भी चुनाव होने वाले। इसमें पाकिस्तान की भी रूचि। जबकि श्रीलंका तख्तापलट झेल चुका। पाक में जनरल मुनीर राजनीतिक नेतृत्व को अपनी मुद्री में कर चुके। यूरोपीय देश रूस और यूक्रेन युद्ध के चलते हांफरहे। कई देशों को अर्थव्यवस्था डावांडोल। इधर, यूरोपीय यूनियन को लगातार अमरीकी घुड़की। वैसे, परेशान तो रूस भी। इन सबके बीच अमरीका। जिसकी आतंरिक अर्थव्यवस्था डगमगा रही। उसकी जीडीपी 29 ट्रिलियन डालर। लेकिन कर्जा 34 ट्रिलियन डालर हो चुका। जिसे बैंक करना डोनाल्ड ट्रंप के लिए चुनौती है।

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