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सामने बैठे सांप को भी देखना मुश्किल! भारत में पहली बार मिले दो कीलबैक स्नेक, जानिए क्या है खासियत

जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की विविधता के मामले में भारत काफी धनी रहा है। अगर सिर्फ सांपों की बात करें तो भारत में 300 से ज्यादा प्रजातियों के सांप पाए जाते हैं और इनमें से केवल 60 तरह के सांप ही जहरीले हैं। वहीं भारत की जैव विविधिता में एक नया अध्याय जुड़ गया है। वैज्ञानिकों ने सांप की दो नई प्रजातियों की खोज की है जो कि पहले भारत में कभी नहीं देखी गई थीं। वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (WII) देहरादून के वैज्ञानिकों ने बताया है कि देश में दुर्लभ कीलबैक सांपों की भी दो प्रजातियां मौजूद हैं।

क्या होती है सांपों की कीलबैक प्रजाति

कीलबैक प्रजाति के सांप बेहद दुर्लभ माने जाते हैं। अब तक ये पड़ोसी देश म्यांमार में ही देखे गए थे। वैज्ञानिकों ने बताया है कि मिजोरम के न्गेंगपुई वन्यजीव अभयारण्य में रखाइन कीलबैक प्रजाति का सांप पाया गया है। इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश के नमदाफा नेशनल पार्क में कचिन हिल्स कीलबैक सांप पाया गया। इन सापों की खासियत यह है कि ये जहरीले नहीं होते हैं और ये सांप पानी या फिर पानी के आसपास दलदल में रहना पसंद करते हैं।

क्या है कीलबैक सांपों की पहचान

किलबैक सांप देखने में हल्के लाल रंग के होते हैं। इनकी त्वचा परतनुमा होती है और बीच में एक उभरी हुई लकीर होती है। इनकी त्वचा चिकनी नहीं बल्कि खुरदरी होती है। इसी वजह से इन्हें कीलबैक सांप कहा जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस इलाके में अभी सांपों की कई और ऐसी प्रजातियां हो सकती हैं जिनका ब्यौरा किसी दस्तावेज में नहीं मिलता है। ऐसे में यहां बड़े वैज्ञानिक सर्वे की जरूरत है।

त्वचा छिपने में करती है मदद

इन सांपों की खुरदरी पीठ की वजह से इन्हें छिपने में मदद मिलती है। इनकी त्वचा चमकदार होती है और इसलिए प्रकाश का परावर्तन करती है। ऐसे में इनका रंग आसपास के परिवेश की तरह दिखने लगता है। ऐसे में लोगों की निगाह आसानी से इनपर नहीं पड़ती है। खासतौर पर कीचड़ और वेटलैंड में ये एकदम घुल-मिल जाते हैं।

अरुणाचल का नमदाफा नेशनल पार्क जैव विविधिता के लिए काफी प्रसिद्ध है। यह नेशनल पार्क काफी ऊंचाई पर है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जिस तरह से सांप की दो नई प्रजातियां पाई गई हैं, उसी तरह से कई अन्य जीवों की भी प्रजातियां यहां मौजूद हो सकती हैं। ऐसे में पूर्वोत्तर भारत के दुर्गम इलाकों में शोध बढ़ाने की जरूरत है। नई प्रजातियों की खोज और उनके संरक्षण से लुप्तप्राय जीवों को बचाया जा सकता है और जैव विविधता को मजबूत रखा जा सकता है।

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