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छत्तीसगढ़ में बड़ा फर्जीवाड़ा: सीबीएसई की पढ़ाई कराकर सीजी बोर्ड की परीक्षा दिलाई; हाई कोर्ट ने शिक्षा सचिव से मांगा जवाब

बिलासपुर | छत्तीसगढ़ के निजी स्कूलों में चल रहा शिक्षा का बड़ा खेल अब न्यायपालिका की चौखट तक पहुँच गया है। प्रदेश के प्रतिष्ठित नारायणा टेक्नो और एक अन्य निजी स्कूल द्वारा सीबीएसई (CBSE) के नाम पर फर्जीवाड़ा करने का मामला सामने आया है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने स्वतः संज्ञान लिया है और स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव को शपथ पत्र के साथ जवाब पेश करने का कड़ा निर्देश दिया है।

क्या है पूरा मामला?

अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन ने एडमिशन के समय खुद को सीबीएसई बोर्ड से संबद्ध बताया था। साल भर बच्चों को निजी प्रकाशकों की महंगी किताबों से सीबीएसई पैटर्न पर पढ़ाई कराई गई और मोटी फीस वसूली गई। फरवरी में स्कूल ने स्थानीय स्तर पर सीबीएसई पैटर्न पर परीक्षा भी ले ली। असली फर्जीवाड़ा तब उजागर हुआ जब राज्य सरकार ने कक्षा 5वीं और 8वीं के लिए केंद्रीयकृत बोर्ड परीक्षा के निर्देश जारी किए। स्कूल प्रबंधन के पास सीबीएसई की मान्यता नहीं थी, बल्कि वे सीजी बोर्ड (CG Board) से मान्यता लेकर सीबीएसई के नाम पर स्कूल चला रहे थे। आनन-फानन में प्रबंधन ने बच्चों पर सीजी बोर्ड की परीक्षा देने का दबाव बनाया और उनसे दोबारा एग्जाम दिलवाया।

पालकों का आक्रोश और कोर्ट की दखल

इस धोखाधड़ी से नाराज पालकों ने पहले स्कूलों में हंगामा किया और बाद में कलेक्टर बंगले का घेराव कर दिया। मामले की जानकारी जब कोर्ट को मिली, तो चीफ जस्टिस ने इसे जनहित याचिका (PIL) के रूप में स्वीकार किया।

धोखाधड़ी: पालकों का कहना है कि उनके साथ सीधे तौर पर वित्तीय और शैक्षिक धोखाधड़ी हुई है।

महंगी किताबें: सीबीएसई के नाम पर निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें बेची गईं, जबकि अंत में परीक्षा सीजी बोर्ड की दिलवाई गई।

अगली सुनवाई: कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 8 अप्रैल की तिथि तय की है।

आरटीई (RTE) में गड़बड़ी की भी जांच

उल्लेखनीय है कि हाई कोर्ट में आरटीई (शिक्षा का अधिकार) के तहत सीटों को घटाने को लेकर पहले से ही एक जनहित याचिका और हस्तक्षेप याचिका पर सुनवाई चल रही है। इसी दौरान अधिवक्ताओं ने नारायणा टेक्नो और अन्य स्कूलों की मनमानी की जानकारी कोर्ट को दी।

अधिकारियों पर गिर सकती है गाज

राज्य सरकार द्वारा 5वीं और 8वीं की बोर्ड परीक्षा अनिवार्य करने के फैसले ने इस “मान्यता घोटाले” की पोल खोल दी है। अब कोर्ट ने शिक्षा सचिव से पूछा है कि बिना उचित मान्यता के ये स्कूल सीबीएसई का झांसा देकर कैसे संचालित हो रहे थे और विभाग की इस पर क्या निगरानी थी।

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