ललही षष्ठी या हलषष्ठी व्रत 14 अगस्त को आस्था के साथ मनाया जाएगा। माताएं व्रत रहकर संतान के दीर्घायु की कामना व पूजा-अर्चना कर करेंगी। इसे भगवान बलराम, गणेश और गौरी और षष्ठी देवी को अर्पित किया जाता है। यह दिन औदायिक योग होने से अत्यंत ही शुभ माना गया है। इस व्रत को स्त्रियां अपने संतान की लंबी आयु और अच्चे स्वास्थ्य की कामना से करती है। यह व्रत भगवान गणेश, बलराम और गौरी को समर्पित होता है। इस दिन जुते हुए खेत में पैदा अन्न और सब्जियों का प्रयोग नहीं किया जाता है पूजा के बाद तिन्नी का चावल, भैंस की दही, दूध और घी और करमुआ के साग का प्रयोग होता है। जहां पूजा किया जाता है वहां खुश की टहनी गाड़ दी जाती है। कुश को एक छोटा गड्ढा निर्मित कर उसी में आरोपित किया जाता है। समीप की भूमि को मिट्टी और जल से आलेपितकर दिया जाता है।
षष्ठी देवी के निमित्त कुश की छह गांठें दी जाती है। प्रसाद मे महुआ के पत्ते पर महुआ, तिन्नी का चावल और कुछ महिलाएं भैंस की दही भी अर्पित करती है। हरछठ का व्रत यूपी, बिहार, छत्तीसगढ़ में रखा जाता है। संतान की लंबी आयु के लिएयह व्रत खास है। जिन महिलाओं के संतान नहीं वे संतान पाने के लिए इस व्रत को करती हैं। इस दिन शिवपरिवार की पूजा की जाती है और व्रत का संकल्प लिया जाता है। दोपहर के समय छठी माता की पूजा कर कथा सुनी जाती है। इसके बाद परिक्रमा करें। इस व्रत को रखने वाल महिलाएं खेत खलिहान में नहीं जाती। इसके अलावा हल से जुती कोई भी चीज इस व्रत में नहीं खाई जाती है। ऐसा कहा जाता है कि अगर व्रती हरछठ के दिन हल से जुताई वाले जगहों पर चलीं जाएं तो व्रत खंडित माना जाता है।



















