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Historical Restaurants in India: यहां फूड के साथ परोसी जाती हैं आजादी के संघर्ष की यादें

Historical Restaurants in India: मुंबई. आज हम आपको भारत के कुछ ऐसे रेस्टोरेंट की सैर कराते हैं, जो न सिर्फ स्वतंत्रता आंदोलन के गवाह रहे हैं, बल्कि आजादी के बाद बदलते फूड ट्रेंड, टेक्नोलॉजी और खाने की आदतों के बीच भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं. ये पुराने रेस्टोरेंट आज भी प्लेट में इतिहास परोसते हैं.

नई दिल्ली में राजीव चौक के पास स्थित इंडियन कॉफी हाउस की स्थापना 1876 में हुई थी. यह कैफे कम और सांस्कृतिक केंद्र ज्यादा है. यहां की बेंटवुड कुर्सियां, सफेद कपड़ों में वेटर और कॉफी के कप इस बात के गवाह हैं कि यहां लेखकों, छात्रों, क्रांतिकारियों और शिक्षाविदों की लंबी चर्चाएं होती रही हैं. यहां खाने के साथ बातचीत को भी उतना ही महत्व दिया जाता है. मेनू भले ही साधारण हो, लेकिन यहां के विचार आज भी कॉफी के साथ पकते हैं. यहां कई तरह की पॉपुलर कॉफी ड्रिंक मिलती हैं.

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मुंबई के ऐतिहासिक डॉक इलाके के पास ब्रिटानिया एंड कंपनी की स्थापना 1923 में हुई थी. यह रेस्टोरेंट पारसी समुदाय की सादगी और सम्मान का प्रतीक है. यह बेरी पुलाव, कैरामेल कस्टर्ड और ईरानी मेहमाननवाजी के लिए जाना जाता है. यहां किसी तरह की जल्दबाजी नहीं होती. ऑर्डर आराम से लिए जाते हैं और बातचीत खुलकर होती है.

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दार्जिलिंग में ग्लेनारीज की स्थापना 1911 में हुई थी. शुरुआत में यह एक बेकरी थी, जहां यूरोपीय स्टाइल की ब्रेड और पेस्ट्री मिलती थीं. समय के साथ यह फुल सर्विस रेस्टोरेंट और टी रूम बन गया. नेहरू रोड पर स्थित यह जगह अपने बेकरी आइटम, डेजर्ट और कॉन्टिनेंटल डिश के लिए मशहूर है. ग्लेनारीज आज भी अपनी पुरानी इमारत में ही चलता है.

दिल्ली में जामा मस्जिद के पास स्थित करीम की शुरुआत 1913 में हुई थी. इसका रिश्ता मुगल रसोई से जुड़ा रहा है. यह रेस्टोरेंट आज भी मुगलाई खाने के साथ उस दौर की यादें ताजा करता है.

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कोलकाता की पार्क स्ट्रीट पर स्थित मशहूर टी रूम फ्लुरीज की स्थापना 1927 में एक स्विस दंपती ने की थी. वे यूरोप का पेस्ट्री कल्चर यहां लेकर आए. समय के साथ मेनू बदला, लेकिन परंपरा और क्वालिटी आज भी वैसी ही है. फ्लुरीज सिर्फ यादों के लिए नहीं, बल्कि अपने स्टैंडर्ड के लिए भी जाना जाता है.

बेंगलुरु का मवाली टिफिन रूम, जिसे एमटीआर कहा जाता है, दक्षिण भारतीय खाने का बेहतरीन उदाहरण है. इसकी स्थापना 1924 में ब्रिटिश दौर की पाबंदियों के बीच हुई थी. यहां नपे-तुले घी, अच्छी तरह फर्मेंट किया गया बैटर और संतुलित मसालों का इस्तेमाल किया जाता है. एमटीआर की रवा इडली की कहानी युद्ध के समय से जुड़ी है और इसका स्वाद आज भी लोगों को आकर्षित करता है.

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