उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में शिव नवरात्रि का पावन आयोजन 6 से 15 फरवरी 2026 तक भव्य रूप से मनाया जा रहा है। इस बार यह उत्सव 10 दिनों तक चल रहा है, जिसमें प्रतिदिन भगवान महाकाल का अलग-अलग शृंगार किया जा रहा है। यह परंपरा भक्तों के लिए अत्यंत कल्याणकारी मानी जाती है। आज 9 फरवरी को सायंकाल पूजन के बाद घटाटोप शृंगार होगा और कल 10 फरवरी को छबीना शृंगार किया जाएगा। इन दोनों शृंगारों का विशेष महत्व है। आइए विस्तार से समझते हैं इनकी विधि, महत्व और आध्यात्मिक महत्ता।
शिव नवरात्रि क्या है?
शिव नवरात्रि फाल्गुन मास में मनाया जाने वाला विशेष उत्सव है। यह नवरात्रि देवी नवरात्रि से अलग होती है और पूरी तरह भगवान शिव को समर्पित होती है। महाकालेश्वर मंदिर में इस दौरान 9 या 10 दिनों तक प्रतिदिन भगवान का अलग-अलग रूपों में शृंगार किया जाता है। प्रत्येक शृंगार में विशेष सामग्री, वस्त्र, आभूषण और फूलों का प्रयोग होता है। यह आयोजन भक्तों को शिव की विभिन्न शक्तियों और रूपों के दर्शन का अवसर देता है।
घटाटोप शृंगार का महत्व और विधि
घटाटोप शृंगार महाकालेश्वर मंदिर की एक अनोखी परंपरा है। इस शृंगार में भगवान शिव को घट (घड़े) के आकार में सजाया जाता है। घटाटोप का अर्थ है ‘घट का आच्छादन’ या ‘घट के समान रूप’। यह शृंगार भगवान के ब्रह्मांडीय रूप और सृष्टि के स्रोत का प्रतीक है। विधि इस प्रकार है:
- सायंकाल पूजन के बाद शिवलिंग को विशेष रूप से स्नान कराया जाता है।
- उसके बाद घी, दूध, दही, शहद और गंगाजल से अभिषेक किया जाता है।
- भगवान को पीले वस्त्र पहनाए जाते हैं और उनके ऊपर छोटे-छोटे घड़ों से सजावट की जाती है।
- बेलपत्र, धतूरा, भांग और फूलों से श्रृंगार पूरा होता है।
- इस दौरान विशेष मंत्रों का उच्चारण होता है और भक्तों को दर्शन के लिए लाइन लगती है।
यह शृंगार सृष्टि के रहस्य और शिव की अनंत शक्ति को दर्शाता है। भक्तों का मानना है कि घटाटोप शृंगार दर्शन से जीवन की समस्याएं दूर होती हैं और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है।
छबीना शृंगार का महत्व और विधि
छबीना शृंगार महाशिवरात्रि से ठीक पहले या शिव नवरात्रि के दौरान किया जाता है। छबीना का अर्थ है ‘सुंदर रूप’ या ‘छवि रूप’। इस शृंगार में भगवान महाकाल को मानवाकार या राजसी रूप में सजाया जाता है। विधि निम्नलिखित है:
- प्रातः पूजन के बाद नैवेद्य कक्ष में श्री चंद्र मौलेश्वर का पूजन होता है।
- कोटितीर्थ कुंड के पास श्री कोटेश्वर महादेव की पूजा की जाती है।
- इसके बाद बाबा महाकाल को नवीन पीले वस्त्र पहनाए जाते हैं।
- मुकुट, मुंडमाला, फलों की माला और अन्य आभूषण धारण कराए जाते हैं।
- विशेष रूप से सज्जित छबीना रूप में भगवान को दर्शन के लिए रखा जाता है।
- इस दौरान भजन-कीर्तन और आरती होती है।
छबीना शृंगार भगवान के सौंदर्य और राजसी रूप को दर्शाता है। यह शृंगार देखने से भक्तों को आध्यात्मिक और सौंदर्य दोनों स्तर पर आनंद मिलता है।
इन शृंगारों से मिलने वाले लाभ
घटाटोप और छबीना शृंगार दर्शन से भक्तों को कई लाभ मिलते हैं। घटाटोप से सृष्टि की शक्ति और संरक्षण की अनुभूति होती है, जबकि छबीना से सौंदर्य, समृद्धि और राजसी जीवन का आशीर्वाद मिलता है। इन शृंगारों से मानसिक शांति, स्वास्थ्य लाभ और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। श्रद्धालु मानते हैं कि इन दिनों दर्शन करने से जीवन के संकट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि आती है।
महाशिवरात्रि पर देवघर में भी विशेष परंपराएं
महाकालेश्वर मंदिर की तरह देवघर बैद्यनाथ धाम में भी महाशिवरात्रि पर विशेष परंपराएं निभाई जाती हैं। यहां चार प्रहर पूजा, रात्रि जागरण और भव्य शृंगार होता है। इन परंपराओं से भक्तों का विश्वास और बढ़ता है। महाशिवरात्रि पर देवघर और उज्जैन दोनों जगह विशेष ऊर्जा होती है। इन शृंगारों का दर्शन करने से जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं।



















