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दक्षिण डायरी: तमिलनाडु में सत्ता में भागीदारी की लड़ाई

कुल मिलाकर तमिलनाडु की राजनीति इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। दशकों से चली आ रही सत्ता में अकेले शासन की परंपरा अब सहयोगी दलों के दबाव में चुनौती झेल रही है। चाहे द्रमुक कांग्रेस गठबंधन हो या अन्नाद्रमुक भाजपा समीकरण, सत्ता में भागीदारी का सवाल आने वाले चुनावों का केंद्रीय मुद्दा बनता जा रहा है।

मिलनाडु की राजनीति लंबे समय से तीव्र ध्रुवीकरण त की शिकार रही है। बीते लगभग छह दशकों से राज्य की सत्ता पर दो प्रमुख क्षेत्रीय दल द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम बारी.बारी से काबिज होते रहे हैं। दोनों दल न केवल एक दूसरे के कट्टर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं, बल्कि उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक शैली भी भिन्न रही है। इसके बावजूद, इन दोनों दलों में एक महत्वपूर्ण समानता हमेशा से रही है, सत्ता में आने के बाद उन्होंने अपने छोटे सहयोगी दलों को कभी भी वास्तविक सत्ता भागीदारी नहीं दी। अब तक यह स्थापित परंपरा रही है कि चाहे द्रमुक सत्ता में हो या अन्नाद्रमुक, मंत्रिमंडल और शासन की बागडोर पूरी तरह उन्हीं के हाथों में रहती है।

गंभीर चुनौती का सामना

आनेवाले विधानसभा चुनावों से पहले यह परंपरा पहली बार गंभीर चुनौती का सामना कर रही है। दोनों प्रमुख दलों के छोटे सहयोगियों ने अब स्पष्ट शब्दों में कह दिया है कि यदि उनसे सत्ता में आने के लिए समर्थन अपेक्षित है, तो बदले में उन्हें सत्ता में भागीदारी भी चाहिए। अर्थात उनके निर्वाचित विधायकों को मंत्री पद दिया जाना चाहिए। तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी की स्थिति लंबे समय से कमजोर रही है। पिछले लगभग छह दशकों से वह सत्ता से बाहर है और इस दौरान अधिकांश समय उसने द्रमुक के साथ गठबंधन में ही चुनाव लड़े हैं। बीते विधानसभा चुनावों में द्रमुक ने 234 में से 133 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया था। वहीं कांग्रेस के 18 उम्मीदवार भी जीतकर

विधानसभा पहुंचे थे। कांग्रेस को उम्मीद थी कि उसकी इस भूमिका के बदले उसे सरकार में कुछ मंत्री पद मिलेंगे। लेकिन द्रमुक नेतृत्व, विशेषकर नव निर्वाचित मुख्यमंत्री एमके स्टालिननेइस मांग को सिरे से खारिज कर दिया।

अन्य सहयोगी दल

द्रमुक ने न केवल कष्ठीस बल्कि अपने अन्य सहयोगी दलों को भी साफ संदेश दे दिया कि सत्ता में किसी भी तरह की भागीदारी नहीं दी जाएगी। अब जबकि आगामी विधानसभा चुनावों में मुकाबला कड़ा होने की संभावना जताई जा रही है, कांग्रेस के स्थानीय नेता लगातार यह दोहरा रहे हैं कि इस बार वे द्रमुक केसाथ तभी चुनाव लड़ेंगे, जब सत्ता में आने की स्थिति में कांग्रेस को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व देने का स्पष्ट वादा किया जाएगा। दूसरी ओर, द्रमुक के नेताओं ने भी उतनी ही स्पष्टता से कह दिया है कि यदि पार्टी दोबारा सत्ता में आती है, तो पहले की तरह कांग्रेस सहित किसी भी छोटे सहयोगी दल को मंत्री पद नहीं दिया जाएगा। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने गिरीश चोडनकर के नेतृत्व में एक समिति गठित की है, जिसका उद्देश्य द्रमुक नेतृत्व से बातचीत कर सीटों के बंटवारे और गठबंधन की शर्तों पर विचारविमर्श करना है।

सीटों के बंटवारे को लेकर

ये नेता तमिलनाडु कांग्रेस के प्रभारी भी हैं। विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, लेकिन अब तक सीटों के बंटवारे को लेकर कोई ठोस और निर्णायक बातचीत नहीं हो सकी है। हाल ही में हुई एक लंबी बैठक में कांग्रेस के केंद्रीय नेताओं ने राज्य के स्थानीय नेताओं से खुलकर चर्चा की। बैठक में आम राय यह बनी कि द्रमुक के साथ गठबंधन का निर्णय तभी लिया जाना चाहिए, जब वह सत्ता में भागीदारी देने पर सहमत हो। यह भी सुझाव दिया

गया कि कांग्रेस को इस बार अपना अलग घोषणा पत्र जारी करना चाहिए, ताकि उसकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान मजबूत हो सके। पिछले विधानसभा चुनावों में कग्रिस को राज्य में लगभग पांच प्रतिशत वोट मिले थे।

विकल्प जोखिम भरा है

कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता मानते हैं कि यदि द्रमुक सरकार में भागीदारी को लेकर अड़ा रहता है, तो पार्टी को अपने दम पर चुनाव लड़ने का जोखिम उठाना चाहिए। हालांकि यह विकल्प जोखिम भरा है, लेकिन इससे कांग्रेस को अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता दोबारा स्थापित करने का अवसर मिल सकता है। दूसरी ओर, अन्नाद्रमुक का झुकाव लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी की ओर रहा है। भाजपा भले ही राज्य में संगठनात्मक रूप से कमजोर रही हो, लेकिन वह एक बार लोकसभा की एक सीट जीतने में सफल रही है। बताया जाता है कि उन्होंने अन्नाद्रमुक के शीर्ष नेताओं से साफ शब्दों में कहा है कि यदि गठबंधन बनाए रखना है, तो केवल चुनावी तालमेल नहीं, बल्कि गठबंधन की नीतियों और शर्तों को भी मानना होगा। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि गठबंधन सत्ता में आता है, तो भाजपा के कम से कम तीन विधायकों को मंत्री पद दिया जाना चाहिए। इन शतों के सामने आने के बाद अन्नाद्रमुक नेतृत्व ने फिलहाल चुप्पी साध ली है। कुल मिलाकर तमिलनाडु की राजनीति इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। दशकों से चली आ रही सत्ता में अकेले शासन की परंपरा अब सहयोगी दलों केदबाव में चुनौती झेल रही है। चाहे द्रमुक कांग्रेस गठबंधन हो या अन्नाद्रमुक भाजपा समीकरण, सत्ता में भागीदारी का सवाल आनेवाले चुनावों का केंद्रीय मुद्दाबनता जा रहा है।

यह लेखक के अपने विचार हैं।

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