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कानाफूसीः भारत की छाप… ब्रांड ठाकरे… नए चाणक्य… संस्कृत में संभावनाएं… पराकाष्ठा

राजधानी दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल देशों के संसद अध्यक्षों एवं पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन (सीएसपीओसी) में पूरी तरह से भारत की छाप दिखाई दी। विदेश से आए विशेष अतिथियों को भारत के रंग में रंगने के लिए यहां की संस्कृति, परंपरा एवं अतिथि सत्कार का आभास करवाया गया। साथ ही गीत संगीत एवं देसी उत्पादों का तड़का भी। संसद भवन परिसर इसमें पूरा रंगा हुआ नजर आया। फिर समापन के बाद अतिथियों का गुलाबी नगरी का दौरा होना। अपनी मरुचरा के लिए अलग ही मायने। भारत वैसे भी अतिथियों के आदर सत्कार के लिए जाना जाता। हां, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की भूमिका एवं सक्रियता खासी उल्लेखनीय। ऐसा लगा इसके लिए वह पूरी तरह से तैयार थे। मामला कूटनीति एवं राजनय का ही नहीं। बल्कि संबंधों को नया आयाम देने का भी। हां, राष्ट्रमंडल देशों में भारत सबसे बड़ा देश।

ब्रांड ठाकरे

तो महाराष्ट्र में ब्रांड ठाकरे रसातल में। राजनीतिक साख तो गई हो। उद्धव ठाकरे सत्ता और संगठन से भी महरूम हो गए। मराठी कार्ड नहीं चला। न उत्तर एवं दक्षिण भारतीयों का विरोध काम आया। विचारधारा के मामले में पहले ही सीएम की कुर्सी के चलते विचालन कर गए। अब तो पार्टी चलाना भी मुश्किल होगा। क्योंकि बीएमसी के बहाने आर्थिक गर्भनाल मानी कट गई। हां, एकनाथ शिदि ने भाजपा के लिए अपनी उपयोगिता साबित कर दी। उन्होंने अब अपनी प्रासंगिकता भो बढ़ा ली। अब साफसंकेत। अजित पवार आज नहीं तो कल महायुत्ति से बाहर होंगे। जबकि भाजपा का दबदबा बढ़ना तय। अब यूचीटी इससे आगे कहां जाएगी? समय बताएगा। राज ठाकरे तो पहले ही अधरझूल में थे। लेकिन अब उससे ज्यादा उद्धव ठाकरे हो गए। फिर राज ठाकरे की भाषा कहीं भी राजनीतिक मर्यादा के दायरे में नहीं।

नए चाणक्य

महाराष्ट्र से भाजपा के लिए मानो एक नए चाणक्य का उदय हो गया। आप मानकर चलें। नगर निगम चुनावों के बाद सीएम देवेन्द्र फड़नवीस यानी देवा भाऊ का कद भाजपा में बढ़ गया। राष्ट्रीय स्तर पर उनकी हैसियत बढ़ने वाली। मुंबई में अब तो ट्रिपल इंजन की सरकार। और यह मामला केवल बीएमसी का बोर्ड बनने तक ही सीमित नहीं। बल्कि इससे कहीं ज्यादा मायने। फड़नवीस ने लगभग सभी विपक्षी दलों के समीकरण गड़बड़ा दिए। उनका राजनीतिक कैरियर बेहद समृद्ध। एक तो वे नागपुर के रहने वाले। फिर आरएसएस के स्वयंसेवक भी। राजनीतिक का कखय उन्होंने आरएसएस से ही सीखा। वह राजनीतिक परिवार से आते। मात्र 27 साल की आयु में नागपुर के मेयर बने। बद में विधायक और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भी रहे। तीसरी चार सीएम बने। यह उपलब्धि एवं पृष्ठभूमि भाजपा में कई नेताओं के लिए तगड़ी चुनौती !

संस्कृत में संभावनाएं

केन्द्र सरकार शिक्षा व्यवस्था को लगातार समयानुकूल बना रही। अब अकादमी के बजाए व्यावहारिकता पर ज्यादा ओर। रटने के बजाए अभ्यास एवं रुचि पर फोकस। अब सरकार की देसी चिकित्सा व्यवस्था में नई पहल। सो, संस्कृत भाषा के विद्यार्थी भी अब आयुर्वेद की पढ़ाई के जरिए चिकित्सक बन सकेंगे। पहल की गई केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय की ओर से। जरिया बनेगा नेशनल कमीशन पॉर इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन (एसीआईएसएम)। जल्द ही इसके कैम्पस यानी गुरुकुल आकार लेंगे। असल में, अभी तक आयुर्वेद की पढ़ाई के लिए नीट के जरिए ऐसे विद्याधी आ रहे थे। जिनकी रैंक निचली होने के कारण उनका यही विकल्प होता था। लेकिन अब रुचि के आधार पर विद्यार्थी आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में प्रवेश लेंगे। इसमे गुणवत्ता चढ़ेगी। साथ ही विद्यार्थी पढ़ाई के दौरान घुटन महसूस नहीं करेगा। हां, संस्कृत भारत की पहचान। अब रोजगार की संभावनाएं भी।

पराकाष्ठा

पश्चिम बंगाल में शह और मात के खेल की मानो पराकाष्ठा हो रही। ज्यों-ज्यों विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे। ममता बनर्जी का गुस्सा, दबाव एवं तनाव लगातार बढ़ रहा। मानो नियंत्रण खो रही हों। उनके बयानों एवं कदमों से ऐसा लग रहा। वह लगातार तीन बार से राज्य की सत्ता में। लेकिन इस बार उन्हें भाजपा की ओर से तगड़ी चुनौती मिल रही। इसीलिए संवैधानिक पद पर होते हुए भी उसको मर्यादा को तोड़ रहीं। कोलकाता में एक कंपनी पर ईडी द्वारा की गई छापेमारे की कार्रवाई में यह दिखा। इस मामले में उन्हें कोर्ट से राहत तो मिली नहीं। बल्कि कार्रवाई की तलवार लटक रही। चुनाव से पहले कहीं कोई ऐसा निर्णय न आ जाए कि सहानुभूत्ति भी न मिल सके। ऐसी चर्चा। चीच में, राष्ट्रपति शासन तक की चर्चा थी। इधर, भाजपा अपने पत्ते सफाई से चल रही।

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