खुशी यानी ईद, ईद यानी खुशी। दोनों के अर्थ एक ही हैं। इस्लाम में दो ही त्योहारों का प्रामाणिक उल्लेख मिलता है। पहला रमजान पूरा होने की खुशी में ईद अल फितर, जिसे मीठी और छोटी ईद भी कहा जाता है। दूसरा हज पूरा होने की खुशी में ईद अल हज, जिसे ईद अल अजहा और बड़ी ईद भी कहा जाता है। अभी रमजान खत्म होने को हैं, तो मीठी ईद यानी ईद अल फितर की खुशियां हमारे दरवाजे पर दस्तक देने आ रही हैं।
कब मनाई जाएगी ईद
ईद का त्योहार चांद पर निर्भर होता है। अगर 19 तारीख को ईद का चांद दिखा तो ईद का त्योहार 20 मार्च 2026 को मनाया जाएगा। अगर 20 मार्च की शाम को चांद दिखा तो 21 मार्च को भारत में ईद मनाई जाएगी। एक महीने के रोजे पूरे करने के बाद ईद अल फितर की नमाज एक शुकराना है, रब के प्रति कि उसने सामर्थ्य और सेहत बख्शी माह-ए-मुबारक में इबादत की पूंजी जमा करने की।ईद अल फितर को छोटी और मीठी ईद इसलिए भी कहा जाता है, क्योंकि यह त्योहार विशेषकर बच्चों का उत्सव होता है। बच्चों को सबसे पहले मीठी सेवइयां बनाई व खिलाई जाती हैं। नमाज के बाद सबसे पहला काम पास-पड़ोस में शीरनी के साथ पकवानों को बांटना, जो कि बच्चों से ही कराया जाता है। इसका मकसद बच्चों में खाना बांट कर खाने की आदत और जज्बा पैदा करना होता है।
एक-दूसरे के दुख-तकलीफ को साझा करना
ईद की नमाज रब का शुकराना होता है कि उसने उन्हें सेहत भरा जिंदगी का एक साल और दिया, जिसमें वे इबादत कर सके। साथ ही आने वाले साल के लिए सेहत और हलाल की रोजी की दुआएं भी शामिल होती हैं। यहां यह बात विशेष उल्लेखनीय है कि ईद की नमाज के लिए जिस रास्ते से जाते हैं, उस रास्ते से वापस नहीं लौटते। इसका उद्देश्य अधिक लोगों से मिलना-मुलाकात करने के साथ एक-दूसरे के दुख-तकलीफ को साझा करना और यह देखना कि कहीं कोई तकलीफ में तो नहीं है। यदि ऐसा है, तो उसकी तकलीफों को दूर करने का भरसक प्रयास किया जाता है। नमाज के बाद घर लौटने से पहले सभी नमाजी कब्रिस्तान जरूर जाते हैं और अपने सगे-संबंधियों के साथ-साथ सभी दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए दुआ करते हैं। पहले समय जब संचार माध्यम सीमित थे, घर के बुजुर्ग गांव-मुहल्ले के घरों में जाते और गले मिलकर ईद की मुबारकबाद देते थे। एक-दूसरे के पकवानों को चखते जरूर थे। यह उस घर की माली हालत को जानना- समझना होता था कि कहीं कोई परेशानी में तो नहीं है।
क्या है ईद अल फितर का मतलब
इस ईद को ईद अल फितर इसलिए भी कहते हैं कि ईद की नमाज से पहले ही प्रत्येक मुस्लिम को फितरा अदा करना होता है। फितरा एक बेहद छोटी-सी तय की गई रकम होती है, जिस पर समाज के गरीब और लाचारों का हक होता है। यह हर मुस्लिम खुशी-खुशी ईद की नमाज से पहले फिक्र से अदा कर देता है। फितरे में कोई कोताही नहीं बरती जाती। ईद अल फितर को जकात और अहम बना देती है। जकात, पूरे साल की कमाई के ढाई प्रतिशत के हिस्से को कहा जाता है। इस जकात पर गरीब, अनाथ बच्चों और उन बुजुर्गों व औरतों का हक होता है, जिनका इस दुनिया में कोई सहारा तथा कमाई का साधन नहीं होता।



















