सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह पैटरनिटी लीव यानी कि पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने के लिए कानून बनाने पर विचार करे. हमारे समाज की ये धारणा बन चुकी है कि जन्म के बाद शुरुआती दिनों में नवजात को केवल मां की जरूरत पड़ती है. लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने पैटरनिटी लीव पर सुनवाई के दौरान एक ऐसी दलील दी है कि जिसने इस पुरानी सोच को चुनौती देने का काम किया है. अदालत ने एक अहम फैसले में मंगलवार को केंद्र सरकार से कहा कि वह पैटरनिटी लीव यानी कि पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने के लिए कानून बनाने पर विचार करे.
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि “बच्चे के विकास में मां की भूमिका केंद्रीय होती है, लेकिन पिता की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता”. पेटर्निटी लीव सिर्फ एक ‘छुट्टी’ नहीं है, बल्कि यह पिता और बच्चे के बीच ताउम्र रहने वाले रिलेशनशिप की नींव है.
कोर्ट का मानना है कि बच्चे के जन्म के बाद का शुरुआती समय गोल्डन पीरियड होता है जब बच्चा अपने आस-पास की दुनिया को पहचानना शुरु करता हैं.
बच्चे के संपूर्ण विकास में मददगार
इस समय अगर पिता उसके साथ है तो वह बच्चे के संपूर्ण विकास में मददगार होता है. इस समय पिता का स्पर्श उनकी आवाज़ और उनकी मौजूदगी बच्चे के मन में सुरक्षा का भाव पैदा करती है. सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें एक ऐसे नियम को चुनौती दी गई थी जिसके तहत गोद लेने वाली महिला को तभी मातृत्व अवकाश मिलता था जब वह तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद ले. अदालत ने इस प्रावधान को खारिज करते हुए कहा कि गोद लेने वाली मां को भी 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलना चाहिए, चाहे बच्चे की उम्र कुछ भी हो.
पिता की भागीदारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
कोर्ट ने कहा कि ये बात सही है कि बच्चे के विकास में मां की केंद्रीय भूमिका होती है लेकिन पिता की भागीदारी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. खासकर बच्चे जन्म या गोद लेने के शुरुआती समय में पिता का सहयोग मां के लिए भी बहुत जरूरी होता है. पितृत्व अवकाश से पिता भी बच्चे की लालन-पालन की भूमिका में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा सकते हैं.



















