बिलासपुर। जिले के बिल्हा क्षेत्र में एक पटवारी के खिलाफ घूसखोरी और अनियमितताओं के आरोपों के बाद हुई त्वरित कार्रवाई अब चर्चा का विषय बन गई है। हल्का क्रमांक-3 के पटवारी विष्णु प्रसाद निर्मलकर को 1 अप्रैल को निलंबित किया गया था, लेकिन महज एक सप्ताह के भीतर 8 अप्रैल को उनका निलंबन निरस्त कर पुनः पदस्थ कर दिया गया। प्रशासन की इस तेजी ने जहां कुछ लोगों को चौंकाया है, वहीं कार्यप्रणाली पर कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
प्रारंभिक जांच में सही पाए गए थे आरोप
जानकारी के अनुसार, पटवारी पर पैसे लेने और अनियमितताओं के आरोप लगे थे। तहसीलदार बोदरी की प्रारंभिक जांच में आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए जाने के बाद एसडीएम आकांक्षा त्रिपाठी ने 1 अप्रैल को निलंबन की कार्रवाई की थी। आदेश में विभागीय जांच का भी उल्लेख किया गया था, जिससे मामला गंभीर माना जा रहा था।
7 दिन में बदली तस्वीर
मामले ने तब चौंकाने वाला मोड़ लिया, जब 7 अप्रैल को नई जांच रिपोर्ट सामने आई और 8 अप्रैल को निलंबन आदेश निरस्त कर दिया गया। प्रशासन ने इसे “बदली परिस्थितियों” का परिणाम बताया, लेकिन यही तर्क अब सवालों के घेरे में है।
बहाली के साथ हल्का बदला
पटवारी को बहाल करते हुए उनका हल्का क्रमांक बदल दिया गया है। इस पर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या सिर्फ पदस्थापना में बदलाव ही पर्याप्त कार्रवाई है या जवाबदेही तय करने के लिए ठोस कदम जरूरी हैं।
एसडीएम आकांक्षा त्रिपाठी का कहना है कि जांच में आरोप सिद्ध नहीं हुए और कोई ठोस दस्तावेजी प्रमाण नहीं मिले, इसलिए बहाली की गई, हालांकि प्रशासन ने एहतियात के तौर पर हल्का बदल दिया है।
अन्य मामलों में सुस्ती पर सवाल
इसी बीच बिलासपुर तहसील में करीब 10 महीने पहले सामने आए फर्जी ईडब्ल्यूएस प्रमाण पत्र मामले का जिक्र भी हो रहा है, जिसमें अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।
प्रशासनिक कार्यशैली पर उठे प्रश्न
एक ओर जहां इस मामले में महज एक सप्ताह में जांच और फैसला हो गया, वहीं आम शिकायतों में महीनों लग जाते हैं। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह प्रशासनिक सक्रियता का उदाहरण है या फिर प्रक्रिया में असामान्य जल्दबाजी के संकेत।



















