ऋषिकेश। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा है कि अष्ट सिद्धियां और नव निधियां केवल चमत्कारी शक्तियों या भौतिक संपदा का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि यह स्वयं पर विजय, विनम्रता और आंतरिक शुद्धता का गहरा संदेश देती हैं।
उन्होंने बताया कि हनुमान चालीसा एक ऐसा दिव्य ग्रंथ है, जिसका हर शब्द गहन अर्थ और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा हुआ है। इसमें भक्ति की पवित्र धारा के साथ अदम्य साहस और समर्पण का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यह महान कृति गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित है, जिसमें भक्ति, प्रेम और सेवा-भाव का अनूठा समावेश है।
स्वामी चिदानंद सरस्वती के अनुसार, हनुमान चालीसा में वर्णित “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता” पंक्ति हनुमान जी की दिव्य शक्ति और करुणा को दर्शाती है। हनुमान केवल शक्ति के प्रतीक नहीं, बल्कि त्याग, सेवा और प्रभु-भक्ति के जीवंत स्वरूप हैं। उनके चरणों में समर्पण करने से व्यक्ति को केवल भौतिक समृद्धि ही नहीं, बल्कि आत्मिक वैभव की भी प्राप्ति होती है।
उन्होंने कहा कि अणिमा से वशित्व तक की सिद्धियां दरअसल मनुष्य के भीतर की उन शक्तियों का प्रतीक हैं, जो काम, क्रोध, लोभ और मोह पर विजय प्राप्त करने से प्रकट होती हैं। वहीं नव निधियां जीवन के नौ मूल्यों—सौंदर्य, शांति, धैर्य, ज्ञान, विनम्रता और शुद्धता—का प्रतीक हैं।
स्वामी जी ने आगे कहा कि हनुमान जी का अमरत्व उस चेतना का प्रतीक है, जो भक्ति, साहस और समर्पण से जुड़ी है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि शक्ति का उपयोग स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि धर्म और सेवा के लिए होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हनुमान जी शक्ति, करुणा और ज्ञान के ऐसे प्रतीक हैं, जिनका जीवन अहंकार से रहित और सेवा के भाव से परिपूर्ण है। यदि व्यक्ति अपने भीतर के भय को समाप्त कर भक्ति और सेवा के मार्ग पर चलता है, तो वह भी उस दिव्यता को प्राप्त कर सकता है, जो शाश्वत और अटूट है।




















