आज 16 जुलाई 2026, गुरुवार से विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा प्रारंभ हो रही है, जिसका समापन 24 जुलाई को होगा। रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, अपने भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ दिव्य रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं और मौसी के घर गुंडिचा मंदिर जाते हैं। गुंडिचा मंदिर से वापसी की यात्रा को बहुदा यात्रा कहा जाता है। आइए जानते हैं कि भगवान जगन्नाथ हर साल क्यों मौसी के घर जाते हैं और क्या खाते हैं और कैसे होती है उनकी मेहमाननवाजी।
भगवान जगन्नाथ की मौसी कौन हैं?
हिंदू धर्म ग्रंथों में भगवान जगन्नाथ की मौसी को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार, प्रभु जगन्नाथ की मौसी का नाम गुंडिचा देवी है। इसी कारण गुंडिचा मंदिर को भक्त प्रेम भाव से मौसी का घर भी कहते हैं। मौसी के घर भगवान सात दिनों तक विराजमान रहते हैं।
हर साल मौसी के घर क्यों जाते हैं प्रभु जगन्नाथ
मान्यताओं के अनुसार, जब पहली बार भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी के घर पहुंचे तो, उनका बहुत प्रेम और आदर भाव से स्वागत किया गया। मौसी ने भगवान से निवेदन किया कि वे हर साल उनसे मिलने अवश्य आएं। कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ ने उनके स्नेह का मान रखते हुए हर साल आने का वादा किया। तभी से रथ यात्रा के दौरान मौसी के घर जाने की परंपरा चली आ रही है।
मौसी के घर कितने दिन ठहरते हैं प्रभु
भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ मुख्य मंदिर से विशाल और भव्य रथों पर सवार होकर निकलते हैं और गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं। यहां प्रभु सात दिन ठहरते हैं।
क्या खाते हैं प्रभु?
बहुदा यात्रा के दौरान गुंडिचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ को पोड़ा पीठा का भोग लगाया जाता है। यह ओडिशा प्रसिद्ध पारंपरिक व्यंजन है। इसे चावल, गुड़, दाल, नारियल और घी से बनाया जाता है। मान्यता है कि स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान बीमार हो जाते हैं। ऐसे में मौसी देवी गुंडिचा उन्हें प्रेम भाव से पोड़ा पीठा खिलाती हैं।
भगवान जगन्नाथ की कैसे होती है मेहमान नवाजी:
भगवान जगन्नाथ का जब गुंडिचा मंदिर में आगमन होता है तो मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। इस दौरान वैदिक मंत्रोच्चार और आरती की जाती है। प्रभु को विधि-विधान से भोग लगाया जाता है और भक्त जयकारों के साथ अतिथि के समान जगन्नाथ भगवान का स्वागत करते हैं।


















