रायपुर। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने दुकान में वर्षों से हो रहे पानी के रिसाव (सीपेज) की समस्या का समाधान नहीं करने पर रायपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) को फटकार लगाते हुए पीड़ित आवंटी के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। आयोग ने आरडीए को दुकान में सीपेज की समस्या का स्थायी समाधान करने तथा आवंटी को एक लाख रुपये मुआवजा और पांच हजार रुपये वाद व्यय देने का आदेश दिया है।
आयोग के अध्यक्ष प्रशांत कुंडू और सदस्य डॉ. आनंद वर्गीस की पीठ ने यह निर्णय राजेंद्र नगर निवासी दिलीप पृथवानी द्वारा दायर परिवाद पर सुनाया। परिवादी ने बताया कि उन्होंने 17 अक्टूबर 2007 को न्यू राजेंद्र नगर स्थित गोविंद सागर व्यावसायिक परिसर के भूतल पर स्थित दुकान क्रमांक एस-79 खरीदी थी। दुकान खरीदने के बाद से ही छत और दीवारों से पानी का रिसाव तथा सीलन की समस्या बनी हुई है।
परिवादी के अनुसार उन्होंने वर्ष 2010 से 2024 के बीच कुल छह बार आरडीए कार्यालय में लिखित शिकायतें दर्ज कराईं। शिकायतों की प्राप्ति की पावती भी उनके पास मौजूद है। इसके बावजूद समस्या का समाधान नहीं किया गया। जबकि वे नियमित रूप से दुकान का भू-भाटक और मेंटेनेंस शुल्क जमा करते रहे हैं।
14 वर्षों तक नहीं हुई सुनवाई
जब लगातार शिकायतों के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई तो परेशान होकर दिलीप पृथवानी ने उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि लंबे समय तक शिकायतों और विधिक नोटिसों के बावजूद आरडीए ने समस्या के निराकरण के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया। आयोग के नोटिस पर आरडीए की ओर से अधिवक्ता उपस्थित हुए, लेकिन प्राधिकरण की तरफ से कोई जवाबदावा अथवा बचाव संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जा सके। इसे गंभीर लापरवाही मानते हुए आयोग ने माना कि वर्षों तक सीपेज की समस्या का समाधान नहीं करना सेवा में स्पष्ट कमी (डिफिशिएंसी इन सर्विस) का मामला है।
मुआवजा और कानूनी खर्च देने का आदेश
आयोग ने आरडीए को निर्देश दिया है कि वह दुकान में हो रहे पानी के रिसाव का स्थायी समाधान सुनिश्चित करे। साथ ही परिवादी को मानसिक पीड़ा, आर्थिक नुकसान और लंबे समय तक हुई असुविधा के लिए एक लाख रुपये मुआवजा तथा पांच हजार रुपये कानूनी खर्च अदा करे। उपभोक्ता आयोग के इस फैसले को सरकारी एजेंसियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे उन उपभोक्ताओं को भी राहत मिलने की उम्मीद है, जो लंबे समय से निर्माण संबंधी खामियों और विभागीय उदासीनता का सामना कर रहे हैं।


















