अयोध्या राम मंदिर चंदा चोरी मामले में बुधवार को एक नया और बड़ा मोड़ आ गया है। इस घोटाले की जांच कर रही स्पेशल टीम (SIT) को मुख्य आरोपी अविनाश शुक्ला के घर से लकड़ी की एक गुप्त दान पेटी मिली है, जिस पर “रामराज्य कोष” लिखा हुआ है। क चौंकाने वाले मामले में पुलिस को ऐसी जानकारी मिली है, जिससे फर्जी दान वसूली के नेटवर्क की आशंका जताई जा रही है। जांच में सामने आया है कि कुछ जगहों पर ‘रामराज्य कोष’ के नाम से दान पेटी और QR कोड के जरिए चंदा इकट्ठा किया जा रहा था।
पुलिस के अनुसार, प्रारंभिक जांच में यह संदेह जताया जा रहा है कि इन दान पेटियों और डिजिटल भुगतान माध्यमों का उपयोग नकली तरीके से चंदा वसूली के लिए किया जा रहा था। इसी आधार पर मामले को गंभीरता से लिया गया है और आगे की जांच शुरू कर दी गई है। अधिकारियों का कहना है कि यह पता लगाया जा रहा है कि यह नेटवर्क कितना बड़ा है और इसमें कौन-कौन लोग शामिल हैं। साथ ही, यह भी जांच का विषय है कि जुटाई गई राशि का उपयोग कहां किया जा रहा था। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस दान पेटी पर डिजिटल चंदा लेने के लिए एक QR कोड भी चिपका हुआ था। पुलिस को शक है कि इस पेटी और QR कोड का इस्तेमाल मंदिर परिसर से बाहर भक्तों से अवैध रूप से चंदा वसूलने के लिए किया जा रहा था।
क्या ये है नकली दान पेटी?
पुलिस अब जांच कर रही है कि क्या भगवान राम के नाम पर इस नकली दान पेटी और QR कोड के जरिए भक्तों की आस्था के साथ खिलवाड़ कर पैसा सीधे आरोपियों के खातों में ट्रांसफर किया जा रहा था। कोर्ट ने SIT को इस मामले की गहराई से जांच करने के लिए 15 दिनों का अतिरिक्त समय दे दिया है। अब पुलिस इन डिजिटल ट्रांजैक्शन की कड़ियों को जोड़ेगी।फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स अब इस QR कोड की जांच करेंगे ताकि यह पता लगाया जा सके कि यह किस बैंक खाते से जुड़ा था, इसे किसने बनवाया था और अब तक इसके जरिए कुल कितना पैसा बटोरा गया है। SIT की शुरुआती जांच में मंदिर के अंदर चंदा संभालने के तरीकों में कई बड़ी खामियां और लापरवाहियां सामने आई हैं।
क्या है ‘राम राज्य कोष’ के पीछे की कहानी?
हालांकि, न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, स्वयंसेवक सुंदरलाल ने कहा, “5 जून को पुलिस अविनाश के साथ आई। तब हमें पता चला कि कुछ नकदी बरामद हुई है, और भी बहुत कुछ। अविनाश शुक्ला प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक थे, गुरुजी ने उन्हें यहां रहने के लिए जगह दी थी। उन्होंने अपने बेरोजगार भाई को भी यहां रखा, जो पानी बेचता था। जहां तक उनकी जीवनशैली की बात है, अभिषेक शुक्ला पिछले 10 वर्षों से यहां रह रहे थे। वे अच्छे व्यवहार वाले थे और उनका जीवन ठीक चल रहा था। पहले वे छात्र थे और अभी छोटे थे। अब तक सब कुछ उनके साथ सामान्य लग रहा था। हालांकि, उनका भाई पिछले डेढ़ साल से उनके साथ रह रहा था।
उन्होंने आगे बताया, “यह दान पेटी 2017-18 की है, जब राम मंदिर के निर्माण के लिए विवेक सृष्टि से राम जन्मभूमि तक 71 दिनों की यात्रा की गई थी। उसी यात्रा के दौरान गुरुजी को दान राशि इक्ट्ठा करने के लिए यह पेटी मिली थी। तब से यह पेटी गुरुजी के पास ही है।”
गड़बड़ियां कहां हुईं?
कैश मैनेजमेंट (पैसों के रखरखाव), सीसीटीवी की निगरानी और वहां काम करने वाले कर्मचारियों के वेरिफिकेशन में भारी लापरवाही बरती गई। यहां तक कि बैंक (SBI) की तरफ से चंदा गिनने के लिए जिस प्राइवेट एजेंसी के लोग रखे गए थे, वे भी अब पुलिस के रडार पर हैं।
इससे पहले हुई छापेमारी में आरोपी अविनाश शुक्ला के घर से भारी मात्रा में कैश भी बरामद हुआ था। पुलिस को कुछ ऐसे सीसीटीवी फुटेज भी मिले हैं, जिसमें मामला सामने आने से ठीक पहले अविनाश एक बैग में कुछ छिपाकर ले जाता हुआ दिख रहा है।
मामला अब राजनीतिक रूप से गरमाया
इस खुलासे के बाद उत्तर प्रदेश में सियासत भी तेज हो गई है। विपक्षी दल राम मंदिर जैसे बड़े धार्मिक स्थल के प्रबंधन और चंदे की सुरक्षा पर सवाल उठा रहे हैं और पूरी पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, मंदिर ट्रस्ट का कहना है कि जो भी दोषी पाया जाए, चाहे वह कितने ही बड़े पद पर क्यों न हो, उसके खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
आगामी 15 दिनों में SIT इस “रामराज्य कोष” दान पेटी और उसके डिजिटल रिकॉर्ड्स को खंगालकर इस पूरे रैकेट के पीछे छिपे सभी चेहरों को बेनकाब करने की तैयारी में है।


















