अपनी बहादुरी और प्रतिबद्धता की बदौलत वांगपान ने जल्द ही सिख लाइट इन्फैंट्री में जगह बना ली। उनकी दक्षता को देखते हुए पिछले ही महीने उन्हें मेजर के पद पर पदोन्नत किया गया है। अरुणाचल के वांचो आदिवासी समुदाय से सैन्य अधिकारी बनने वाले वह पहले व्यक्ति हैं।
दशकों पहले मजरूह सुल्तानपुरी ने ममता फिल्म के लिए ये पंक्तियां लिखी थीं- रहे न रहे हम, महका करेंगे। बनके कली, बन के सबा बाग-ए-वफा में… ये पंक्तियां बेहद मानीखेज हैं। ये हर उस शख्स से वाबस्ता हैं, जिसने एक मिसाली जिंदगी जी है। गांव-शहर, सूबा-सूबा, देश-देश, ऐसे कई लोग हैं, जिनकी समाधियों या जन्मभूमि से गुजरते हुए हमारी गर्दन सम्मान में झुक जाती है या उस माटी से प्रेरित होकर उसकी तरफ मुड़ जाती है। अरुणाचल का एक घर ऐसा ही है, जहां जीवट के धनी लाइचट पॉल वांगपान पैदा हुए।
इस प्रदेश के लोंगडिंग जिले में एक छोटा-सा गांव है लोंगफोंग। वांगपान यहीं के एक गरीब वांचो परिवार में पैदा हुए। वांचो अरुणाचल का प्रमुख आदिवासी समुदाय है। गांव के ही सरकारी स्कूल से शिक्षा आरंभ हुई, मगर वह मुकम्मल न हो सकी। जैसा कि अक्सर गरीब बच्चों के साथ होता है, वांगपान को भी अपने परिवार की आर्थिक मदद के लिए पढ़ाई छोड़कर काम पकड़ना पड़ा। तब वह आठवीं जमात में थे। संयोग से सीमा सड़क संगठन के जनरल रिजर्व इंजीनियर फोर्स (जीआरईएफ) में रात्रि-चौकीदार का काम मिल गया। वांगपान ने काम करना तो शुरू कर दिया था, मगर इसे अपनी नियति मानने को वह तैयार न थे।

दुर्गम इलाकों के बाशिंदे शरीर से ही मजबूत नहीं होते, उनके इरादे भी फौलादी होते हैं। फौजियों के बीच रहते हुए वांगपान पर वर्दी का आकर्षण कुछ यूं तारी हुआ कि उन्होंने ठान लिया कि वह फौजी वर्दी पहनकर ही रहेंगे। नौकरी करते हुए वांगपान ने दूरस्थ शिक्षा के तहत पढ़ाई फिर से शुरू कर दी। तब क्या ही उम्र रही होगी! पर घर की मदद की मजबूरी, रात-रात भर जागकर चौकीदारी की जिम्मेदारी और फिर परीक्षा की तैयारियों ने वांगपान को आराम के बारे में सोचने का अवकाश भी कहां दिया?
जहां के किशोर आसानी से नशे की गिरफ्त में आ जाते हों, वहां का एक गरीब युवा स्कूल छोड़कर चौकीदारी करने को मजबूर हो जाता है, पर गलत रास्ता नहीं चुनता। अपनी मजबूरी को पैरों की बेड़ियां नहीं बनने देता, बल्कि ऊंचे सपने देखता है और उसे साकार करता है। है न फख्र की बात!
मेहनत रंग लाई, वह सेना में बतौर जवान चुन लिए गए थे। जाहिर है, पूरा गांव खुश था, मगर वांगपान के लिए तो यह बस एक पड़ाव था। कहते हैं, कामयाबी का मद लोगों को बिगाड़ देता है, पर अगर उसका चस्का लग जाए, तो जिंदगी संवर जाती है। वांगपान ने अपने लिए अब एक नई मंजिल मुकर्रर की थी- सैन्य अधिकारी बनने की मंजिल! यह कोई आसान लक्ष्य नहीं था, पर जीवन ने उन्हें आसानी अब तक बख्शी ही कहां थी? एक फौजी की लंबी अनुशासित दिनचर्या होती है। वांगपान को रात में ही किताब पलटने की मोहलत मिलती।
जैसे अर्जुन की साधना निर्णायक पलों में चिड़िया की आंख पर केंद्रित हो गई थी, वांगपान का ध्यान सेवा चयन बोर्ड (एसएसबी) की परीक्षाओं पर जा टिका था। इसके लिए कॉलेज की न्यूनतम अनिवार्य डिग्री की दरकार थी। वांगपान के पास कोई विकल्प नहीं था। उन्हें हर भूमिका के साथ इंसाफ करना था। वह दिन भर सैन्य जवान के कर्तव्य निभाते और देर रात तक पढ़ाई करते। दूरस्थ शिक्षा के जरिये ग्रेजुएशन की डिग्री मिलते ही ऑफिसर रैंक की परीक्षा के लिए उनका रास्ता खुल गया था। जाहिर है, सैन्य अधिकारियों को चुनने की प्रक्रिया बेहद कठिन है, अंतिम चयन से पहले अभ्यर्थियों का पांच दिनों तक कठोर मूल्यांकन होता है। वांगपान के लिए सहूलियत यह थी कि वह फौजी थे और इस पूरी प्रक्रिया को अच्छी तरह जानते थे।
साल 2020 के जून में वह पल आ ही गया, जब वांगपान की वर्षों पुरानी साध पूरी हुई। वह सिख लाइट इन्फैंट्री में लेफ्टिनेंट के ओहदे पर कमीशन हुए। यह उनके लिए कितनी बड़ी उपलब्धि थी, इसका अंदाजा सिर्फ इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि वांचो आदिवासी समुदाय से कमीशन प्राप्त करने वाले वह पहले व्यक्ति हैं। जाहिर है, पूरे अरुणाचल के लिए वह गौरव का पल था। मुख्यमंत्री प्रेमा खांडू ने निजी तौर पर उन्हें बधाई देते हुए प्रदेश के लाखों नौजवानों के लिए एक प्रेरक व्यक्तित्व बताया। वांगपान के ऊपर दोहरी जिम्मेदारी थी। एक भारतीय सैन्य अधिकारी होने के नाते अपेक्षित जिम्मेदारियों का अचूक निर्वाह और दूसरी, वांचो समुदाय के युवाओं को देश की मुख्यधारा से जुड़ने के लिए प्रेरित करना।
भारतीय सेना की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें धर्म, जाति, रंग और समुदाय से नहीं, बहादुरी और प्रतिबद्धता से पहचान बनती है, अपनी दिलेरी और समर्पण भाव की बदौलत वांगपान ने जल्द ही इन्फैंट्री में अपनी जगह बना ली। उनके अनुभव, उनकी दक्षता को देखते हुए पिछले ही महीने उन्हें मेजर के पद पर पदोन्नत किया गया है। निस्संदेह, उन्होंने यह मुकाम अपनी काबिलियत से हासिल किया है और यह उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, मगर उनके साथ-साथ वांचो समुदाय भी पदोन्नत हुआ है। वांगपान की अगली हर उपलब्धि पूरे अरुणाचल, खासकर उनके समुदाय के लिए गौरव के पल लेकर आएगी। यह बात वह भी जानते हैं, लेकिन वह अपने प्रदेश व समुदाय से और मिसालें चाहते हैं। इसलिए लेफ्टिनेंट बनने के बाद उन्हें जब भी पूर्वोत्तर भारत की नई पीढ़ी से बात करने का मौका मिला, उन्होंने उन्हें ऊंचे सपने देखने और उसके लिए खूब पढ़ने को प्रेरित किया।
हमारे समाज को वांगपान का क्यों कृतज्ञ होना चाहिए? क्योंकि अपने परिश्रम, अपनी क्षमताओं से उन्होंने न सिर्फ अपनी उपलब्धियों को विस्तार दिया है, बल्कि लाखों आंखों में नए सपनों के बीज बोए हैं। जिस प्रदेश के किशोर आसानी से नशे की गिरफ्त में आ जाते हों, वहां का एक गरीब किशोर किताब छोड़कर चौकीदारी करने को मजबूर हो जाता है, पर गलत रास्ता नहीं चुनता। अपनी मजबूरी को पैरों की बेड़ियां नहीं बनने देता, बल्कि एक राष्ट्र-प्रहरी बनने के सपने देखता है, उसके लिए जीतोड़ उद्यम करता है और फिर अपने सपने को साकार करता है। ऐसे सपूत पर अरुणाचल ही नहीं, पूरे हिन्दुस्तान को फख्र होना चाहिए।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह
















