रायपुर। रायपुर जिले के आरंग विकासखंड में महानदी पर निर्मित समोदा बैराज परियोजना एक बार फिर सवालों के घेरे में है। करीब 125 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किए गए इस बैराज में निर्माण पूरा होने के तुरंत बाद खामियां सामने आने का दावा किया गया है। आरोप है कि इन कमियों को दूर करने के लिए बाद में अलग-अलग कार्यों के नाम पर लगभग 50 करोड़ रुपये की अतिरिक्त प्रशासकीय स्वीकृतियां ली गईं, जिनमें से करीब 20 करोड़ रुपये केवल मरम्मत कार्यों पर खर्च कर दिए गए। अब पूरे मामले में वित्तीय और तकनीकी अनियमितताओं की शिकायतों के बाद स्वतंत्र जांच की मांग जोर पकड़ने लगी है।
जानकारी के अनुसार राजीव समोदा-निसदा व्यपवर्तन योजना के तहत महानदी पर समोदा बैराज का निर्माण वर्ष 2012 में एकमुश्त निविदा के माध्यम से शुरू हुआ था। लगभग छह वर्षों के निर्माण के बाद वर्ष 2018 में परियोजना पूरी हुई। शिकायतों के अनुसार निर्माण के तुरंत बाद ही बैराज के विभिन्न हिस्सों में तकनीकी खामियां और क्षति सामने आने लगी।
एजेंसी की जवाबदेही तय करने के बजाय फिर खर्च हुई सरकारी राशि
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि मूल निर्माण में आई कमियों के लिए निर्माण एजेंसी या परियोजना से जुड़े अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के बजाय सरकारी खजाने से अतिरिक्त राशि खर्च कर सुधार और मरम्मत कराई गई। वर्ष 2018 के बाद अलग-अलग चरणों में विभिन्न कार्यों के लिए लगभग 50 करोड़ रुपये की अतिरिक्त स्वीकृतियां जारी की गईं, जिनमें से करीब 20 करोड़ रुपये केवल मरम्मत मद में खर्च हुए।
इसी को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि जब परियोजना पर पहले ही 125 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके थे तो निर्माण के तुरंत बाद मरम्मत की आवश्यकता क्यों पड़ी। यदि निर्माण में गुणवत्ता संबंधी कमी थी तो उसकी जिम्मेदारी निर्माण एजेंसी और संबंधित अधिकारियों पर क्यों नहीं तय की गई।
निविदा से गुणवत्ता तक जांच की मांग
मामले में परियोजना के निर्माण, पर्यवेक्षण और क्रियान्वयन से जुड़े तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायतों में निविदा प्रक्रिया, निविदा शर्तों के अनुमोदन, गुणवत्ता नियंत्रण, अतिरिक्त कार्यों की अनुशंसा तथा बाद में मरम्मत कार्यों की स्वीकृति की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई है।
सूत्रों के अनुसार शिकायतें राज्य शासन तक पहुंच चुकी हैं। इनमें सरकारी धन के अनावश्यक और दोबारा उपयोग का आरोप लगाते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। प्रथम दृष्टया यह सवाल भी उठ रहा है कि मूल निर्माण में सामने आई खामियों को नजरअंदाज कर सुधार कार्यों के नाम पर अतिरिक्त राशि स्वीकृत क्यों की गई।
ईओडब्ल्यू या विशेषज्ञ समिति से जांच की मांग
शिकायतकर्ताओं ने तकनीकी, वित्तीय और प्रशासनिक पहलुओं की जांच आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (ईओडब्ल्यू), एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) अथवा किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी या विशेषज्ञ समिति से कराने की मांग की है। साथ ही निर्माण एजेंसी, संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और सलाहकारों की भूमिका तय कर आवश्यक कार्रवाई करने की भी मांग उठाई गई है।
इन बिंदुओं पर भी उठे सवाल
शिकायत में परियोजना की उपयोगिता और स्वीकृति प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें पूछा गया है कि परियोजना के लिए स्वीकृत सिंचाई क्षमता और वास्तविक सिंचित क्षेत्र में कितना अंतर है। साथ ही यह भी जांच की मांग की गई है कि प्रस्तावित कमांड क्षेत्र का कोई हिस्सा पहले से अन्य सिंचाई परियोजनाओं से सिंचित तो नहीं था। यदि ऐसा था तो परियोजना के लाभों का आकलन और स्वीकृति किस आधार पर दी गई।
फिलहाल पूरे मामले में स्वतंत्र जांच की मांग के बीच सिंचाई विभाग की कार्यप्रणाली और परियोजना की गुणवत्ता को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं। मामले में शासन स्तर पर जांच की सुगबुगाहट भी तेज बताई जा रही है।


















