पितृ पक्ष के दिन पूरी तरह से पूर्वजों को समर्पित होते हैं। इन 16 दिनों में लोग अपने पितरों को प्रसन्न करने के लिए उनका तर्पण करते हैं और आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, श्राद्ध करते हैं। पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके मोक्ष के लिए ये पवित्र अनुष्ठान किया जाता है। मान्यता है कि बिहार के गया जी में पितरों का पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष मिलता है और उनका आशीर्वाद मिलता है। मरने के बाद पूर्वजों का पिंडदान करना और धार्मिक अनुष्ठान करने के बारे में तो सभी जानते हैं लेकिन क्या कभी सुना है कि एक मंदिर ऐसा भी जहां पर लोग जीवित रहते हुए ही खुद का पिंडदान और श्राद्ध करते हैं। सुनकर अजीब लग रहा होगा लेकिन बिहार के गया जी में एक मंदिर ऐसा भी है जहां पर लोग जीते जी अपना पिंड दान करते हैं।
आखिर जीवित रहते हुए क्यों करते हैं पिंडदान
हिंदू धर्म में मरने के बाद संतान दिवंगत आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और श्राद्ध करती है। मान्यता है कि अगर किसी व्यक्ति का मरने के बाद पिंडदान और तर्पण ना किया जाए तो उसकी आत्मा पृथ्वी पर ही भटकती रहती है। ऐसे में जिन लोगों की कोई संतान नहीं होती या फिर उनका क्रिया कर्म करने वाला सगा-संबंधी नहीं होता तो ऐसे लोग जीवित रहते हुए ही खुद का पिंडदान इस मंदिर में कर देते हैं। मान्यता है कि इस मंदिर में स्वयं भगवान विष्णु जनार्दन स्वरूप में विराजमान हैं और मनुष्य का पिंडदान स्वीकार करते हैं। यहीं नहीं जो लोग वैराग्य धारण कर लेते हैं या फिर सन्यास ले लेते हैं ऐसे लोग भी इस मंदिर में अपना पिंड दान करते हैं।
3 दिन तक होता है श्राद्ध कर्म
बिहार के गया जी में आने के बाद भगवान जनार्दन स्वादी के इस मंदिर में पहुंचकर संकल्प लिया जाता है और अपने पापों का प्रायश्चित करने के बाद पूजा-अर्चना और जाप करके दही-चावल से बने 3 पिंड भगवान को चढ़ाए जाते हैं।
कहां पर बना है ये मंदिर
बिहार के गया जी में ये एक इकलौता मंदिर है जहां पर जीवित इंसान अपना पिंडदान करता है। वैसे तो गया जी में 54 पिंड देवी और 53 पवित्र जगहें हैं लेकिन ये एक एकमात्र स्वयं के पिंडदान की जगह है। जो भस्म कूट पर्वत पर स्थित मां मंगला गौरी मंदिर के उत्तर में स्थित है। यहां पर भगवान विष्णु जनार्दन स्वरूप में स्थित हैं।
मंदिर की खासियत
जनार्दन मंदिर काफी पुराना है और पूरी तरह से चट्टानों से बना हुया है। यहां पर भगवान विष्णु की दिव्य प्रतिमा बनी है और लोग स्वयं के पिंड दान के साथ इस जगह पर पूर्वजों के पिंडदान के लिए भी आते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार जनार्दन मंदिर पहले काफी छोटा था। बाद में राजा मानसिंह ने इसका जीर्णोद्धार कराया। मंदिर की धार्मिक पहचान यहां पर बनी पिंडवेदी और आत्मश्राद्ध की परंपरा से जुड़ी हुई है।


















