भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी तिथि को दोपहर 12 बजे श्रीराधा का जन्म हुआ था। लोक प्रचलित कथा के अनुसार, एक दिन गोप वृषभानु नदी में स्नान कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने नदी के किनारे कमल के फूल पर एक नन्हीं बच्ची को देखा। वृषभानु ने बच्ची को गोद में उठा लिया और उसे अपनी पुत्री के रूप में पालन-पोषण किया।
वायु रूप में गर्भ में प्रवेश करने की भी मान्यता
श्रीराधा के जन्म को लेकर एक अन्य किंवदंती भी प्रचलित है। इसके अनुसार राधा वायु रूप में वृषभानु की पत्नी कीर्ति के गर्भ में प्रवेश कर गई थीं और बाद में उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया। मान्यता है कि जिस स्थान पर श्रीराधा का जन्म हुआ था, वह स्थान अब रावल स्थित मंदिर के गर्भगृह के रूप में प्रसिद्ध है।
कब है राधाष्टमी
वर्ष 2026 में अष्टमी तिथि 18 सितंबर को दोपहर करीब 1 बजे शुरू होगी और 19 सितंबर को दोपहर 3:26 बजे समाप्त होगी। राधा अष्टमी के दिन सुबह 7 बजकर 39 मिनट से 9 बजकर 11 मिनट अच्छा मुहूर्त है। दोपहर 1 बजकर 46 मिनट से 3 बजकर 18 मिनट तक श्रीजी की पूजा कर सकते हैं।
बरसाने की लाडली जी का जन्मोत्सव
शास्त्रों में श्रीराधा को कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति कहा गया है। इन्हें प्रेम, करुणा और भक्ति की देवी माना गया है। राधा का जिक्र महाभारत में नहीं है। भागवत पुराण में भी नहीं है। राधा के संबंध में सबसे पहले जानकारी पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलती है। पद्म पुराण के अनुसार राधा वृषभानु नामक गोप की पुत्री थीं, इसलिए इन्हें वृषभानुजा भी कहते हैं। कुछ विद्वान मानते हैं कि राधा का जन्म यमुना के करीब रावल ग्राम में हुआ था। बाद में उनके पिता बरसाना में बस गए, लेकिन यह मान्यता अधिक है कि उनका जन्म बरसाना में हुआ था। राधा रानी का विश्व प्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है। बरसाना में राधा को ‘लाड़ली’ कह कर पुकारा जाता है।
क्यों सहा श्रीकृष्ण का वियोग
कृष्ण के साथ राधा की भक्ति की शुरुआत मध्यकाल में हुई। राधा का विस्तार से वर्णन महाकवि जयदेव ने अपने संस्कृत काव्य ‘गीत गोविंद’ में किया है। दक्षिण के आचार्य निम्बार्क ने जनमानस में सर्वप्रथम राधा-कृष्ण की युगल उपासना को प्रचलित किया था। इससे पहले कहीं भी राधा की पूजा कृष्ण के साथ नहीं की जाती थी। राधा-कृष्ण की युगल भक्ति की शुरुआत निम्बार्क, वल्लभ, राधावल्लभ, सखीभाव संप्रदाय आदि ने की थी।
ब्रह्मवैवर्त पुराण की एक कथा के अनुसार गोलोक में कृष्ण के पार्षद और सखा श्रीदामा राधा के शाप के कारण पृथ्वी पर शंखचूड़ राक्षस के रूप में जन्मे। वहीं श्रीदामा के शाप के कारण राधा ने भी पृथ्वी पर सौ वर्ष तक कृष्ण का वियोग सहा। जब कृष्ण वृंदावन छोड़कर मथुरा चले गए, तब राधा ने अपना सारा जीवन कृष्ण की याद में बिताया। ऐसी मान्यता है कि राधा और कृष्ण का पुनर्मिलन कुरुक्षेत्र में हुआ था। सूर्य ग्रहण के अवसर पर द्वारिका से कृष्ण अपने परिवार के साथ और राधा वृंदावन से वहां आई थीं। एक दूसरी मान्यता के अनुसार अपने जीवन के अंतिम दिनों में राधा कृष्ण के पास द्वारका चली गई थीं।

















