27 सितंबर 1825 को पहली बार ट्रेनों का इस्तेमाल यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह लाने-ले जाने के लिए किया गया. यह पहला मौका था जब लोगों ने ट्रेन का सफर किया था. पहले सिर्फ खदानों से कोयला ढोने के लिए ट्रेनों का इस्तेमाल शुरू हुआ था. इंसानों को लेकर चलने वाली पहली ट्रेन इंग्लैंड की एक कोयला खदान से कुछ लोगों को लेकर चली और फिर अलग-अलग जगह जहां यात्रियों को उतरना था, रोक-रोककर उतारते चली गई. इस तरह ट्रेन के पहले सफर की शुरुआत हुई थी.
पहली यात्री ट्रेन शुरू करने का आइडिया भी काफी दिलचस्प था. इंग्लैंड के एक कोयला खदान से माल ढोने के लिए रेल वैगन बनाने वाली कंपनी ने अपनी लागत निकालने के लिए एक्स्ट्रा कमाई के लिए ट्रेन का पब्लिक ट्रांसपोर्ट के रूप में इस्तेमाल शुरू किया. पहली पैसेंजर ट्रेन को रॉबर्ट स्टीफेंसन एंड कंपनी ने बनाया था. यह एक रेलवे कंपनी थी जो 1825 से 1863 तक पूर्वोत्तर इंग्लैंड में ऑपरेट करती थी. सितंबर 1825 तक कंपनी ने अपने लेनदारों से बचने के लिए एक्स्ट्रा कमाई करने की सोची. पहली पैसेंजर ट्रेन को शिल्डन के पास की कोयला खदानों से स्टॉकटन-ऑन-टीज और डार्लिंगटन को जोड़ने वाली ट्रेक पर चलाने का फैसला किया गया. इसके लिए कोयला ढोने वाले वैगनों में बेंच लगाने के लिए अलग से वैगन और लोकोमोटिव की जरूरत थी. फिर इस पहली यात्री ट्रेन को जॉर्ज स्टीफेंसन ने डिजाइन किया. इसके लिए एक्सपेरिमेंट नामक एक रेलवे कोच 26 सितंबर 1825 की शाम को लाया और लोकोमोशन नंबर 1 से जोड़ा गया. इस कोच को एक दिन पहले न्यूकैसल से सड़क मार्ग से अपनी यात्रा पूरी करने के बाद ऐक्लिफ लेन स्टेशन पर पहली बार पटरियों पर रखा गया था.
जॉर्ज स्टीफेंसन और कंपनी के अन्य सदस्यों ने उद्घाटन दिवस की तैयारी के लिए लोकोमोटिव और कोच को शिल्डन ले जाने से पहले डार्लिंगटन की एक एक्सपेरिमेंटल यात्रा की. इस यात्रा की बागडोर जॉर्ज के बड़े भाई जेम्स स्टीफेंसन के हाथ में थी. 27 सितंबर 1825 को लोकोमोशन संख्या 1 यात्रियों को ले जाने वाला दुनिया का पहला स्टीम लोकोमोटिव बना. इसे पहली बार नॉर्थ ईस्ट इंग्लैंड में पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए खोली गई लाइन स्टॉकटन और डार्लिंगटन रेलवे पर चलाया गया था. इस प्रकार ग्रेट ब्रिटेन में रेलवे प्रणाली दुनिया में सबसे पुरानी है. वहीं पहली बार यात्री ट्रेन के रूप में चलने वाली इस ट्रेन का नाम लोकोमोशन संख्या 1 था.
खदान से कोयला ले जाने के लिए बने इस रेल रूट पर अलग- अलग जगह जाने वाले लोगों को बैठाया गया. फिर उस रूट में जहां तक जिसे जाना था उस हिसाब से उनसे पैसे लिये और ट्रेन रोककर यात्रियों को उतार दिया गया. इस तरह इंग्लैंड के स्टॉकटन और डार्लिंगटन के बीच पहली बार भाप इंजन से चलने वाली यात्री ट्रेन की शुरुआत हुई. इस रेलगाड़ी ने 37 मील का सफर 14 मील प्रति घंटे की रफ्तार से तय किया था. यह घटना दुनिया में सार्वजनिक रेल परिवहन की शुरुआत का प्रमाण है. पहली यात्री ट्रेन में 300 यात्रियों के लिए जगह बनाई गई थी. फिर भी ट्रेन 450 से 600 लोगों को लेकर रवाना हुई. इनमें से अधिकांश खाली वैगनों में यात्रा कर रहे थे, लेकिन कुछ कोयले से भरे वैगनों के ऊपर भी बैठ गए थे. वैगनों के बीच ब्रेकमैन रखे गए. फिर ट्रेन चल पड़ी. इसकी अगुआई एक व्यक्ति ने किया, जिसके हाथ में झंडा था. इसने नीचे की ओर ढलान पर गति पकड़ी और 10 से 12 मील प्रति घंटे (16 से 19 किमी/घंटा) तक पहुंच गई.
इससे फील्ड हंटर्स (घोड़ों) पर सवार लोग पीछे रह गए. उन्होंने ट्रेन के साथ बने रहने की कोशिश की थी. ट्रेन तब रुकी जब कंपनी के सर्वेक्षकों और इंजीनियरों को ले जा रही वैगन का एक पहिया टूट गया. वैगन को वहीं छोड़ दिया गया और ट्रेन आगे बढ़ गई. ट्रेन फिर से रुकी. इस बार लोकोमोटिव की मरम्मत के लिए 35 मिनट का ठहराव हुआ. इसके बाद फिर से ट्रेन चल पड़ी. पहले जब कोयला ढोने के लिए ट्रेन चलती थी, तो रेलगाड़ी के इंजन के आगे घोड़े पर सवार एक व्यक्ति रहता था. उसके हाथ में एक झंडा रहत था.
15 मील प्रति घंटे (24 किमी/घंटा) की गति तक पहुंचने से पहले डार्लिंगटन शाखा जंक्शन पर रुकने पर इसका स्वागत लगभग 10,000 लोगों ने किया. दो घंटे में साढ़े आठ मील (14 किमी) की दूरी तय की गई थी और दो स्टॉप के लिए 55 मिनट घटाने पर यह 8 मील प्रति घंटे (13 किमी/घंटा) की औसत गति से यात्रा कर चुका था. कोयले के छह वैगन गरीबों में वितरित किए गए, श्रमिकों जलपान के लिए रुक गए और ब्रुसेलटन से आए कई यात्री डार्लिंगटन में उतर गए, जहां उनकी जगह दूसरे लोग सवार हो गए. इस तरह एक्स्ट्रा कमाई के लिए कोयला ढोने वाले वैगन में लोगों को बैठाकर उनके गंतव्य तक छोड़ने का किराया वसूल किया गया. वहीं पहली बार ट्रेन का इस्तेमाल पब्लिक ट्रांसपोर्ट के तौर पर शुरू हुआ. यह ट्रेन इंग्लैंड के स्टॉकटन और डार्लिंगटन के बीच चली थी. यह पहली सार्वजनिक रेलगाड़ी थी.


















