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Badrinath Dham: सर्दियों में कहां विराजते हैं भगवान बद्री विशाल? जानें 6 महीने का रहस्य

उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित बद्रीनाथ धाम भगवान विष्णु के प्रमुख तीर्थस्थलों में शामिल है। इसे भू-वैकुंठ भी कहा जाता है। मान्यता है कि यहां भगवान विष्णु बद्री विशाल के रूप में विराजमान हैं। हर साल देशभर से श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लेकिन सर्दियों में जब भारी बर्फबारी के कारण मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं, तो भक्तों के मन में सवाल उठता है कि इस दौरान भगवान बद्री विशाल की पूजा कहां होती है। दरअसल, कपाट बंद होने के बाद भी भगवान की पूजा-अर्चना से जुड़ी परंपराएं जारी रहती हैं। आइए जानते हैं बद्रीनाथ धाम से जुड़ी इस खास परंपरा के बारे में।

बद्रीनाथ धाम को क्यों कहते हैं भू-वैकुंठ?

बद्रीनाथ धाम को भू-वैकुंठ कहने के पीछे गहरी धार्मिक मान्यता है। हिंदू धर्म में वैकुंठ को भगवान विष्णु का दिव्य निवास माना गया है। मान्यता है कि बद्रीनाथ में भगवान विष्णु बद्री विशाल के रूप में विराजमान हैं। इसी वजह से इस धाम को धरती पर भगवान विष्णु का निवास यानी भू-वैकुंठ कहा जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने इस क्षेत्र में नर-नारायण के रूप में तपस्या की थी। कहा जाता है कि माता लक्ष्मी ने उन्हें कठिन मौसम से बचाने के लिए बदरी यानी बेर के वृक्ष का रूप धारण किया था। इसी मान्यता को बद्रीनाथ नाम से भी जोड़ा जाता है। अलकनंदा नदी और हिमालय की ऊंची चोटियों के बीच स्थित यह धाम श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है।

बद्रीनाथ मंदिर के कपाट 6 महीने क्यों रहते हैं बंद?

बद्रीनाथ मंदिर समुद्र तल से लगभग 3,133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। सर्दियों में यहां कड़ाके की ठंड पड़ती है और भारी बर्फबारी के कारण रास्तों पर आवाजाही मुश्किल हो जाती है। ऐसे मौसम में श्रद्धालुओं की यात्रा और मंदिर तक पहुंचना कठिन होता है। इसी वजह से हर साल शीतकाल में मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं।

आमतौर पर मंदिर के कपाट अप्रैल या मई में खुलते हैं और अक्टूबर या नवंबर में बंद होते हैं। हालांकि, कपाट खुलने और बंद होने की तिथियां धार्मिक पंचांग और परंपराओं के अनुसार तय की जाती हैं। कपाट बंद करने से पहले विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इसके बाद शीतकाल के लिए पूजा की व्यवस्था दूसरे निर्धारित स्थलों पर जारी रहती है।

सर्दियों में कहां होती है भगवान बद्री विशाल की पूजा?

बद्रीनाथ मंदिर के कपाट बंद होने के बाद भगवान बद्री विशाल की पूजा से जुड़ी परंपराएं जोशीमठ और पांडुकेश्वर में निभाई जाती हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार, भगवान की उत्सव मूर्ति को कपाट बंद होने के बाद पांडुकेश्वर स्थित योगध्यान बदरी मंदिर ले जाया जाता है। यहां शीतकालीन पूजा की जाती है।

वहीं, जोशीमठ स्थित नरसिंह मंदिर भी बद्रीनाथ धाम की शीतकालीन पूजा परंपरा से जुड़ा प्रमुख स्थान है। जोशीमठ को ज्योतिर्मठ के नाम से भी जाना जाता है। इस तरह मुख्य मंदिर के कपाट बंद रहने के बावजूद भगवान की उपासना और पूजा-अर्चना का क्रम नहीं रुकता है। श्रद्धालु शीतकाल में इन स्थानों पर दर्शन कर सकते हैं।

बद्रीनाथ मंदिर में कौन करते हैं भगवान की पूजा?

बद्रीनाथ धाम में भगवान विष्णु की पूजा वैदिक विधि-विधान के अनुसार की जाती है। मंदिर के मुख्य पुजारी को रावल कहा जाता है। परंपरागत रूप से रावल केरल के नंबूदरी ब्राह्मण समुदाय से होते हैं। मंदिर में पूजा की व्यवस्था धार्मिक परंपराओं और निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित होती है।

भगवान बद्री विशाल के दर्शन

धार्मिक मान्यता के अनुसार, आदि शंकराचार्य ने बद्रीनाथ में भगवान विष्णु की मूर्ति को पुनः स्थापित किया था। इसी वजह से इस धाम का संबंध वैष्णव भक्ति के साथ-साथ भारतीय धार्मिक परंपरा से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। यहां आने वाले श्रद्धालु भगवान बद्री विशाल के दर्शन के साथ पूजा-अर्चना कर आध्यात्मिक शांति की कामना करते हैं।

बद्रीनाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालु ना केवल मुख्य मंदिर के दर्शन करते हैं, बल्कि भारत के अंतिम गांव माणा, व्यास गुफा, गणेश गुफा और सरस्वती नदी के उद्गम स्थल जैसे ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन भी करते हैं।

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