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अनुसूचित जाति आयोग के आदेश को हाई कोर्ट ने किया निरस्त, आपराधिक मामलों पर अधिकार को लेकर अहम टिप्पणी

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अनुसूचित जाति आयोग के एक आदेश को रद्द करते हुए कहा है कि कोई भी वैधानिक आयोग आपराधिक अपराध में किसी व्यक्ति को दोषी ठहराकर सजा नहीं सुना सकता। कोर्ट ने आयोग के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें एक असिस्टेंट प्रोफेसर को एससी-एसटी अधिनियम के तहत दोषी ठहराते हुए FIR दर्ज करने की सिफारिश की गई थी।

आयोग ने FIR की सिफारिश की थी

मार्च 2021 में अनुसूचित जाति आयोग ने एससी-एसटी अधिनियम की धारा 3(1) के तहत प्रोफेसर मृगेश कुमार यादव के खिलाफ लगाए गए आरोपों को सही ठहराया और उनके खिलाफ FIR दर्ज करने की सिफारिश की।

आयोग के इस आदेश को यादव ने हाई कोर्ट में चुनौती दी। उनकी ओर से अधिवक्ता कबीर कलवानी ने दलील दी कि आयोग ने अपनी वैधानिक शक्तियों की सीमा का उल्लंघन करते हुए मामले में दोष निर्धारित करने जैसा काम किया है। उनके मुताबिक, आयोग की भूमिका सिफारिश करने तक सीमित है, वह आपराधिक मामले में अदालत की तरह फैसला नहीं सुना सकता।

क्या है पूरा मामला ?

दरअसल, पूरा मामला कुछ ऐसा है कि छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के बरपाली सरकारी कॉलेज की एक छात्रा ने असिस्टेंट प्रोफेसर मृगेश कुमार यादव पर आरोप लगाया था कि उन्होंने 2019 में नकल के मामले को दबाकर उसे ब्लैकमेल किया. यादव और उनके सहयोगी ने उसे परीक्षा के दौरान नकल करते हुए पकड़ा था.युवती ने यह भी आरोप लगाया कि, उसका यौन उत्पीड़न किया गया.

पूरा कांड तब बड़ा और हो गया पुलिस की जांच में आरोप बेबुनियाद निकले थे. जिसके फैसले से नाराज छात्रा राज्य अनुसूचित आयोग में गई. मार्च 2021 में आयोग ने एससी-एसटी अधिनियम की धारा 3(1) के तहत प्रोफेसर मृगेश कुमार यादव पर पर लगे आरोपों को सही ठहराया और FIR दर्ज कराने की सिफारिश की.

यादव के वकील ने क्या कहा ?

आयोग के फैसले पर यादव के वकील कबीर कलवानी ने कहा कि आयोग ने उन्हें दोषी ठहराकर अपनी वैधानिक शक्तियों का उल्लंघन किया है. बकौल वकील आयोग ने सिफारिश करने वाली के बजाय फैसला सुनाने वाली संस्था के तहत का किया.

इसपर आयोग की वकील पूर्णिमा सिंह ने तर्क दिया कि निर्देश सलाहकारी था और इसका मकसद एससी समुदाय के सदस्यों के अधिकारियों की रक्षा करना था. इसी तर्क को हाई कोर्ट ने खारिज किया. कोर्ट ने आयोग की सीमाओं के बारे में बताया और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए निर्देश रद्द किया.

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