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छत्तीसगढ़ में खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल: 14 दिन की जगह महीनों बाद आती है जांच रिपोर्ट, मिलावटखोरों पर कार्रवाई सुस्त

रायपुर। छत्तीसगढ़ में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग द्वारा बड़ी संख्या में खाद्य नमूने लिए जा रहे हैं, लेकिन उनकी जांच रिपोर्ट समय पर नहीं आने से मिलावटखोरों पर कार्रवाई की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है। नियमों के अनुसार किसी भी खाद्य नमूने की जांच रिपोर्ट 14 दिनों के भीतर मिल जानी चाहिए, जबकि वास्तविकता यह है कि कई मामलों में रिपोर्ट आने में महीनों लग रहे हैं।

विभागीय जानकारी के अनुसार प्रदेश की प्रयोगशालाओं में विशेषज्ञों और तकनीकी कर्मचारियों की कमी के कारण हजारों नमूनों का विश्लेषण लंबित है। यही वजह है कि कार्रवाई में देरी होने से मिलावट करने वालों में कानून का भय भी कम होता जा रहा है।

जहां जांच हुई, वहां बड़ी संख्या में मिले अमानक खाद्य पदार्थ

प्रदेश में खाद्य पदार्थों की मौके पर जांच के लिए नौ चलित खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाएं संचालित हैं। पिछले दो वर्षों में इन मोबाइल लैब के माध्यम से 29,792 खाद्य नमूनों की प्राथमिक जांच की गई, जिनमें से 2,637 नमूने अमानक पाए गए। आंकड़े बताते हैं कि जहां-जहां जांच पहुंची, वहां संदिग्ध और मिलावटी खाद्य सामग्री भी सामने आई।

इसी दौरान “स्यबने खायो, बने रहिबो” अभियान के तहत प्रदेशभर में 1,720 किलो पनीर, 230 किलो कुंदा और 685 किलो खोवा जब्त किया गया। इससे संकेत मिलता है कि यदि जांच का दायरा बढ़ाया जाए तो और भी बड़े स्तर पर मिलावट के मामले सामने आ सकते हैं।

हजारों नमूनों की रिपोर्ट लंबित

विभाग के अनुसार वर्तमान में 553 विधिक (लीगल) नमूने और 1,202 निगरानी (सर्विलांस) नमूने अब भी विश्लेषण की प्रक्रिया में हैं। बढ़ते लंबित मामलों को देखते हुए हाल ही में करीब 1,100 नमूने भारत सरकार से मान्यता प्राप्त निजी प्रयोगशालाओं में भी जांच के लिए भेजे गए हैं। खाद्य निरीक्षक होटल, रेस्टोरेंट, कैंटीन और अन्य प्रतिष्ठानों से नमूने लेकर उन्हें निर्धारित प्रक्रिया के तहत प्रयोगशाला भेजते हैं। रिपोर्ट आने के बाद संबंधित कारोबारी को सूचना दी जाती है और उसे रेफरल लैब में दोबारा जांच कराने का भी अधिकार होता है। इससे पूरी प्रक्रिया और लंबी हो जाती है।

निजी प्रयोगशालाओं में अधिकांश नमूने मानक

अधिकारियों का कहना है कि निजी प्रयोगशालाओं में भेजे गए अधिकांश नमूने मानकों के अनुरूप पाए जा रहे हैं। वहीं मोबाइल फूड टेस्टिंग लैब में दूध में पानी की मिलावट, मसालों की गुणवत्ता तथा जलेबी, समोसे जैसे खाद्य पदार्थों सहित लगभग दस प्रकार की प्राथमिक जांच की जाती है। संदिग्ध खाद्य सामग्री मिलने पर उसे मौके पर ही नष्ट कराया जाता है, जबकि कानूनी कार्रवाई के लिए विस्तृत लैब रिपोर्ट आवश्यक होती है।

चार महीने पहले शुरू हुई आधुनिक प्रयोगशाला भी बंद

खाद्य जांच व्यवस्था को मजबूत बनाने के उद्देश्य से भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के सहयोग से करीब चार महीने पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर की माइक्रोबायोलॉजी खाद्य प्रयोगशाला शुरू की गई थी। हालांकि भवन में पानी भरने और सीपेज की समस्या के कारण यह प्रयोगशाला फिलहाल बंद पड़ी है। इससे जांच क्षमता बढ़ाने की योजना को भी झटका लगा है।

गंदगी मिलने पर रेस्टोरेंट पर 25 हजार का जुर्माना

इधर रायपुर नगर निगम के जोन-10 स्वास्थ्य विभाग ने पचपेड़ीनाका स्थित राजवाड़ा ढाबा थाली रेस्टोरेंट में गंदगी और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के उल्लंघन पाए जाने पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। यह कार्रवाई निगम आयुक्त संबित मिश्रा के निर्देश पर की गई। अधिकारियों के अनुसार रेस्टोरेंट के खिलाफ पिछले कुछ दिनों से लगातार शिकायतें मिल रही थीं।

विशेषज्ञों का मानना, प्रयोगशालाओं को मजबूत करना जरूरी

खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि केवल छापेमारी और नमूने लेने से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी। यदि जांच रिपोर्ट समय पर नहीं आएगी और दोषियों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं होगी तो मिलावटखोरों में कानून का डर नहीं बनेगा। इसके लिए प्रयोगशालाओं में विशेषज्ञों की नियुक्ति, बंद पड़ी लैब को जल्द शुरू करने और जांच में देरी की जवाबदेही तय करने की आवश्यकता है।

आम उपभोक्ता यह जांच नहीं कर सकता कि वह जो दूध, पनीर, मसाले या अन्य खाद्य सामग्री खरीद रहा है, वह सुरक्षित है या नहीं। ऐसे में खाद्य सुरक्षा तंत्र की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि मिलावट की शिकायतों पर त्वरित जांच और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

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