CG Farmer Crisis: छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले का धमधा इलाका पपीता उत्पादन के लिए जाना जाता है। यहां हर साल हजारों टन पपीते की पैदावार होती है और यह किसानों की प्रमुख नकदी फसल मानी जाती है। लेकिन इस बार हालात अलग हैं। खेतों में ट्रैक्टर चल रहे हैं, मगर फसल काटने के लिए नहीं बल्कि उसे नष्ट करने के लिए।
बसनी गांव समेत कई इलाकों में किसान अपनी तैयार पपीते की फसल उखाड़ने को मजबूर हैं। जिन पौधों को तैयार करने में महीनों की मेहनत और लाखों रुपये खर्च हुए, अब वही खेतों में बर्बाद हो रहे हैं। किसानों का कहना है कि लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन बाजार में खरीदार नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में फसल बचाने की बजाय खेत खाली करना ही मजबूरी बन गया है।
वैश्विक तनाव और मौसम की मार ने बढ़ाई परेशानी
किसानों के मुताबिक हाल के वैश्विक तनाव और आपूर्ति संबंधी समस्याओं का असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक पहुंचा है। डीजल की उपलब्धता और कीमतों में उतार-चढ़ाव से सिंचाई व्यवस्था प्रभावित हुई है। वहीं दूसरी ओर तेज आंधी और खराब मौसम के कारण बिजली आपूर्ति भी बाधित हुई।
कई गांवों में बिजली के खंभे और तार क्षतिग्रस्त होने से लंबे समय तक सिंचाई प्रभावित रही। ऐसे में किसानों को डीजल जनरेटर के सहारे फसल बचाने की कोशिश करनी पड़ी। बसनी गांव के किसान शेर सिंह के अनुसार केवल कुछ दिनों में जनरेटर और सिंचाई पर एक लाख रुपये से अधिक खर्च हो गया। इसके बावजूद फसल को उचित बाजार नहीं मिला, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति और कमजोर हो गई।

मंडियों तक नहीं पहुंच पाई फसल
धमधा के किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बाजार की रही। किसानों का कहना है कि इस बार बाहरी राज्यों के व्यापारी और खरीदार बहुत कम संख्या में पहुंचे। दिल्ली, हरियाणा और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े बाजारों में माल भेजने के लिए पर्याप्त वाहन भी उपलब्ध नहीं हो सके।
नतीजतन खेतों में तैयार पपीते समय पर बाजार तक नहीं पहुंच पाए। पपीता एक जल्दी खराब होने वाली फसल है, इसलिए लंबे समय तक खेत में रखने का विकल्प भी नहीं था। कई किसानों ने मजबूरी में फसल को खेत में ही नष्ट कर दिया, जबकि कुछ ने उसे पशुओं के चारे के रूप में उपयोग किया। किसानों का कहना है कि मेहनत और लागत दोनों डूब गईं, लेकिन बिक्री नहीं हो सकी।
बढ़ती लागत ने तोड़ी किसानों की कमर
पिछले कुछ वर्षों में बागवानी फसलों की खेती की लागत तेजी से बढ़ी है। ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग शीट, खाद, कीटनाशक और मजदूरी जैसी आवश्यक चीजों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। किसान मधुसूदन राणा बताते हैं कि पहले एक एकड़ बागवानी फसल तैयार करने में जहां 15 हजार रुपये तक खर्च आता था, वहीं अब यह लागत 25 से 30 हजार रुपये या उससे अधिक पहुंच गई है।
बिजली की अनियमित आपूर्ति ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। किसानों को नियमित रूप से जनरेटर का उपयोग करना पड़ रहा है, जिससे उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में बाजार से उचित मूल्य नहीं मिलने पर किसानों के लिए खेती घाटे का सौदा साबित हो रही है।
MSP की मांग और राहत का इंतजार
किसानों का कहना है कि धान जैसी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था है, लेकिन पपीता और अन्य बागवानी फसलों के लिए ऐसी कोई सुरक्षा नहीं है। यही वजह है कि बाजार में कीमत गिरने या खरीदार नहीं मिलने की स्थिति में पूरा जोखिम किसानों को उठाना पड़ता है।
किसानों की मांग है कि सरकार बागवानी फसलों के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य या गारंटीड खरीद व्यवस्था लागू करे। कृषि मंत्री रामविचार नेताम का कहना है कि सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से किसानों की मदद कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर किसान अब भी राहत का इंतजार कर रहे हैं। फिलहाल धमधा के खेतों में खड़ी फसलें किसानों की बेबसी और कृषि संकट की कहानी बयां कर रही हैं।



















