बिलासपुर। धान का कटोरा कहलाने वाला छत्तीसगढ़ अब केवल सुगंधित और स्वादिष्ट चावल के लिए ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्यवर्धक चावल के उत्पादन में भी नई पहचान बना सकता है। बदलती जीवनशैली, मधुमेह, एनीमिया और कुपोषण जैसी चुनौतियों के बीच वैज्ञानिकों द्वारा विकसित ‘डिजाइनर राइस’ को भविष्य की पोषण सुरक्षा का अहम विकल्प माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पारंपरिक धान किस्में दुबराज, विष्णुभोग, जीराफूल और नागकेसर में बायोफोर्टिफिकेशन तकनीक के माध्यम से आयरन, जिंक, उच्च प्रोटीन, विटामिन तथा कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स (लो-जीआई) जैसे गुण विकसित किए जाएं, तो राज्य वैश्विक स्तर पर प्रीमियम और हेल्दी चावल का प्रमुख उत्पादक बन सकता है।
बिलासपुर संभाग सहित प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में बड़ी संख्या में किसान धान की खेती करते हैं। ऐसे में पोषणयुक्त धान की खेती किसानों की आय बढ़ाने के साथ उन्हें नए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार भी उपलब्ध करा सकती है। हेल्दी फूड की बढ़ती मांग के कारण ऐसे चावल को सामान्य किस्मों की तुलना में बेहतर कीमत मिलने की संभावना है।
विशेषज्ञों के अनुसार लाल और काला चावल प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं। खासकर ब्लैक राइस हृदय स्वास्थ्य, रोग प्रतिरोधक क्षमता और कोशिकाओं की सुरक्षा के लिए लाभकारी माना जाता है। वहीं हाई-प्रोटीन चावल बच्चों, गर्भवती महिलाओं और कुपोषण से जूझ रहे लोगों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) स्वास्थ्य और पोषण को ध्यान में रखते हुए चावल की सात विशेष श्रेणियां विकसित कर चुका है। इनमें आयरन, जिंक, विटामिन, प्रोटीन और कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स जैसे पोषक तत्वों पर विशेष ध्यान दिया गया है। वर्तमान में फोर्टीफाइड और बायोफोर्टीफाइड चावल का उत्पादन भी लगातार बढ़ रहा है और इन्हें सरकारी पोषण योजनाओं में शामिल किया जा रहा है।
डिजाइनर राइस की चर्चित किस्म गोल्डन राइस में मौजूद बीटा कैरोटीन शरीर में विटामिन-ए में परिवर्तित होकर आंखों की रोशनी बनाए रखने और रतौंधी जैसी समस्याओं की रोकथाम में सहायक माना जाता है। वहीं आयरन और जिंक युक्त चावल एनीमिया और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी दूर करने में मददगार हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि लो-ग्लाइसेमिक इंडेक्स (लो-जीआई) चावल मधुमेह रोगियों के लिए बेहतर विकल्प बन सकता है, क्योंकि इसके सेवन से रक्त में शर्करा का स्तर सामान्य चावल की तुलना में धीरे-धीरे बढ़ता है। प्रदेश में बढ़ते मधुमेह के मामलों को देखते हुए भविष्य में ऐसे चावल की मांग तेजी से बढ़ने की संभावना है।
रिटायर्ड वैज्ञानिक (एग्रोनॉमी) डॉ. एस.आर. पटेल के अनुसार, अब केवल अधिक उत्पादन ही लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि पोषण सुरक्षा पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है। उनका कहना है कि यदि छत्तीसगढ़ की पारंपरिक सुगंधित धान किस्मों में आधुनिक बायोफोर्टिफिकेशन तकनीक के जरिए पोषण संबंधी गुणों का समावेश किया जाए, तो इन्हें विश्व बाजार में प्रीमियम और स्वास्थ्यवर्धक चावल के रूप में स्थापित किया जा सकता है।


















