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अब आगरा में विराजेंगे अयोध्या के रामलला, मूर्तिकार अरुण योगीराज ने ही इस मूर्ति को तराशा

अयोध्या के राम मंदिर में विराजमान बालस्वरूप रामलला की दिव्य मूर्ति को तराशने वाले मूर्तिकार अरुण योगीराज की कलाकृति अब आगरा के भक्तों को भी दर्शन देगी। एत्मादपुर के गांव नवलपुर में मंदिर श्री ठाकुर जी महाराज के प्रांगण में नव निर्मित भवन में भगवान श्रीराम की मूर्ति स्थापना को लेकर काशी के आचार्य तीन दिवसीय प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का आयोजन कर रहे हैं। शनिवार को एकादशी के दिन भगवान श्रीराम सभी को दर्शन देंगे।

मूर्तिकार अरुण योगीराज ने ही इस मूर्ति को तराशा है। उन्होंने बताया कि पहली बार आगरा में मूर्ति बनाने का मौका मिला है। यहां मन्दिर में पांच फुट ऊंची मूर्ति का निर्माण कृष्ण शिला से होयसल शैली से बनाई गई है। कृष्ण शिला से ही रामलला की मूर्ति बनाई गई थी। मूर्ति बनाने में छह माह का समय लगा। मूर्ति का निर्माण मैसूर में किया गया। गुरुवार को श्रीराम की मूर्ति का नेत्र मिलन मूर्तिकार अरुण योगिराज ने किया। श्रीराम पांच फीट की ऊंचाई के युवा रूप में आशीर्वाद देते हुए नजर आएंगे।

मन्दिर का निर्माण आगरा के विजय दत्त पालीवाल द्वारा कराया गया। प्राण प्रतिष्ठा काशी से आये आचार्य पंडित दिनेश अम्बा शंकर उपाध्याय, आचार्य सुशील पाठक, पंडित प्रभुनाथ, पं. सुरेंद्र गर्ग, पं. अनक उपाध्याय, रौनक उपाध्याय द्वारा की जा रही है। इस दौरान विजय दत्त पालीवाल, कमल पालीवाल, उषा पालीवाल, नरेंद्र पालीवाल, विनोद पालीवाल, हेमंत पालीवाल, अनुराग पालीवाल, आदित्य पालीवाल, अनुराग आदि रहे।

यह गणनाओं पर आधारित साधना है

कोई भी देव मूर्ति सिर्फ पत्थर तराशने से नहीं बनती। यह वेद-शास्त्रों में वर्णित गणनाओं पर आधारित एक साधना है। यह कहना है मूर्तिकार अरुण योगीराज का। वह गुरुवार को आगरा पहुंचे। उन्होंने नवलपुर स्थित मंदिर के लिए निर्मित भगवान श्रीराम की नई मूर्ति की जानकारी दी।

रामलला की मूर्ति बनाकर सब कुछ पा लिया

अयोध्या के नव-निर्मित राम मंदिर के गर्भगृह के लिए बालस्वरूप रामलला की दिव्य मूर्ति को तराशकर मैसूर के शिल्पी अरुण योगीराज करोड़ों भक्तों की आस्था को एक रूप दिया था। अब आगरा के कुबेरपुर में उन्होंने ‘राम’ को तराशकर भक्तों की आस्था को राम की दिव्यता में डुबो दिया है। कुबेरपुर में स्थित श्री ठाकुर महाराज मंदिर में महीसपुर से आए अरुण योगीराज ने इस बारे में काफी कुछ बताया।

वह अपनी सफलता का सारा श्रेय भगवान को देते हैं और कहते हैं कि मैं एक माध्यम था। मैं दुनिया का बहुत भाग्यशाली इंसान हूं। मेरे परिवार की 300 साल की परंपरा है, और यह काम करके मुझे महसूस हुआ कि भगवान ने ही मुझे चुना है। केदारनाथ में शंकराचार्य और सुभाषचंद्र बोस की मूर्ति भी बनायी, लेकिन रामलला की मूर्ति को तराशकर सब कुछ पा लिया।

रामलला की ‘बाल सुलभ मुस्कान’ के रहस्य के बारे में बताया कि इसके लिए मैने कई भारतीय और विदेशी बच्चों के फोटो देखे, लेकिन एक जगह अटक गए थे। उन्होंने बताया कि मूर्ति निर्माण के समय अलग दिखती थी, लेकिन प्राण-प्रतिष्ठा के बाद उन्हें लगा कि भगवान ने अलग ही रूप ले लिया है, और उन्हें लगा कि यह उनका काम नहीं है। उन्होंने बताया कि मैं पत्थर में दो घंटे में चेहरा बना सकता हूं, पत्थर मेरी बात इतनी सुनता है, लेकिन रामलला के लिए 20 दिन में यह नहीं कर पाया, क्योंकि मुझे क्या करना है, यह बहुत ब्लैंक था।

बेटा वेदांत, बेटी सान्वी के साथ भी समय बिताता था। उनके हाव-भाव नोट करता था। उन्होंने कुछ रहस्यमय घटनाओं का भी जिक्र किया। बताया कि जब वह मूर्ति तराशने का काम करते थे, तब हर दिन शाम 4-5 बजे के बीच एक बंदर उनकी कार्यशाला में आता था। यह बात उन्होंने चंपत राय (राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव) को भी बताई थी। आगरा में राम मूर्ति बनाने के बारे में बताया कि मैसूर में मधु पालीवाल मेरी बहुत सम्मानीय हैं। जो मूर्ति श्री ठाकुर महाराज मंदिर में स्थापित होगी उसे तराशने का मौका मिला।

बच्चों को सिखाता हूं

अरुण योगीराज ने बताया कि मैं पांच साल के 10 बच्चों को अपने खर्चे पर प्रशिक्षण देता हूं। जिसमें से कुछ बच्चे बेहतर कर रहे हैं। बताया कि मूर्तिकार अब केवल पारंपरिक कलाकृतियों तक ही सीमित नहीं हैं। वे आधुनिक, अमूर्त और समकालीन कला को भी पत्थर और धातु में ढाल रहे हैं, जिससे उन्हें देश की प्रतिष्ठित कला दीर्घाओं में प्रदर्शन का मौका मिल रहा है।

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