ब्रेकिंग खबरें

छत्तीसगढ़बिलासपुर संभाग

सर्पदंश मुआवजा घोटाला: 10 चरणों की जांच व्यवस्था के बावजूद कैसे हुआ करोड़ों का फर्जीवाड़ा?

बिलासपुर। बिलासपुर जिले में सामने आए कथित सर्पदंश मुआवजा घोटाले ने शासन की पूरी राजस्व और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस प्रक्रिया में एफआईआर, पुलिस जांच, पोस्टमार्टम, बिसरा परीक्षण, तहसील जांच, एसडीएम की अनुशंसा और कलेक्टर की अंतिम स्वीकृति जैसे कई स्तरों की जांच अनिवार्य होती है, उसी व्यवस्था में कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर करोड़ों रुपये का मुआवजा स्वीकृत होने का मामला सामने आया है। अब यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इतनी लंबी प्रक्रिया के बावजूद फर्जी प्रकरणों की पहचान क्यों नहीं हो सकी।

10 चरणों की प्रक्रिया पर उठे सवाल

राजस्व पुस्तक परिपत्र (आरबीसी) के तहत सर्पदंश से मृत्यु होने पर मृतक के परिजनों को चार लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। इसके लिए सबसे पहले थाने में सूचना देकर एफआईआर दर्ज कराई जाती है। पुलिस मौके का पंचनामा तैयार करती है और शव का पोस्टमार्टम कराया जाता है। जरूरत पड़ने पर बिसरा परीक्षण भी कराया जाता है।

इसके बाद मृतक के परिजन एफआईआर और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के साथ एसडीएम कार्यालय में आवेदन प्रस्तुत करते हैं। आवेदन तहसीलदार के माध्यम से पटवारी के पास जांच के लिए भेजा जाता है। पटवारी की रिपोर्ट के आधार पर तहसीलदार प्रतिवेदन तैयार कर एसडीएम को भेजता है। एसडीएम की अनुशंसा के बाद पूरा प्रकरण कलेक्टर के समक्ष रखा जाता है। कलेक्टर की स्वीकृति मिलने के बाद ही राशि जारी होती है और अंततः पीड़ित परिवार को भुगतान किया जाता है।

ऐसे में सवाल यह है कि यदि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मुआवजा स्वीकृत हुआ, तो इन सभी स्तरों पर जांच प्रक्रिया कैसे विफल हो गई।

केवल निचले कर्मचारियों पर कार्रवाई पर उठ रहे सवाल

अब तक पुलिस की कार्रवाई मुख्य रूप से कथित वकीलों, होमगार्ड जवानों, आउटसोर्सिंग कर्मचारियों, तहसील के लिपिकों और अन्य निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित नजर आ रही है। प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि किसी भी मुआवजा प्रकरण को अंतिम स्वीकृति मिलने से पहले कई वरिष्ठ अधिकारियों की जांच और अनुशंसा अनिवार्य होती है। ऐसे में केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई से पूरे नेटवर्क का खुलासा होना मुश्किल माना जा रहा है।

छत्तीसगढ़ प्रदेश लिपिक वर्गीय शासकीय कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष रोहित तिवारी ने भी सवाल उठाते हुए कहा कि पूरे मामले में केवल लिपिकों को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि संबंधित तहसीलदार, एसडीएम और वरिष्ठ अधिकारियों से अब तक पूछताछ तक नहीं की गई है।

‘फ्रॉड ऑन द कोर्ट’ की भी जांच

जांच अब एक नए कानूनी पहलू की ओर बढ़ रही है। पुलिस यह भी जांच करेगी कि क्या राजस्व न्यायालय के समक्ष फर्जी दस्तावेज और मिथ्या साक्ष्य प्रस्तुत कर मुआवजा स्वीकृत कराया गया। यदि ऐसा पाया जाता है तो मामला केवल धोखाधड़ी या कूटरचना तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे न्यायालय को गुमराह कर आदेश प्राप्त करने यानी ‘फ्रॉड ऑन द कोर्ट’ की श्रेणी में भी माना जा सकता है।

लोखंडी शराब कांड ने भी उठाए थे सवाल

फरवरी 2025 में कोनी थाना क्षेत्र के लोखंडी गांव में जहरीली महुआ शराब पीने से सात लोगों की मौत हुई थी। शुरुआती प्रशासनिक रिपोर्ट और पोस्टमार्टम में चार मौतों का कारण सर्पदंश बताया गया था। बाद में ग्रामीणों के विरोध और जांच के बाद स्पष्ट हुआ कि सभी मौतें जहरीली शराब के सेवन से हुई थीं। उस घटना ने भी मौत के कारण दर्ज करने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

17 आरोपी जेल भेजे गए, दो होमगार्ड पुलिस रिमांड पर

सर्पदंश मुआवजा फर्जीवाड़े की जांच में अब तक डॉक्टर, एसडीएम कार्यालय के बाबू, कथित वकील, होमगार्ड जवान और अन्य लोगों सहित 17 आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में जेल भेजा जा चुका है। पुलिस ने नागपुर निवासी डॉ. प्रियंका सोनी समेत एसडीएम कार्यालय के तीन बाबुओं को भी आरोपी बनाया है। वहीं घटना के समय सिम्स चौकी में पदस्थ रहे दो होमगार्ड जवान रामकुमार पाटनवार और रामेश्वर भास्कर को अदालत से पुलिस रिमांड पर लेकर पूछताछ की जा रही है। पुलिस के अनुसार प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि शव अस्पताल पहुंचने की सूचना ये होमगार्ड कथित गिरोह के सरगना तक पहुंचाते थे, जिसके बाद मृतकों के परिजनों से संपर्क कर फर्जी मुआवजा प्रकरण तैयार किए जाते थे।

कलेक्टर बोले-दोषी कोई भी हो, कार्रवाई होगी

बिलासपुर कलेक्टर संजय अग्रवाल ने कहा कि यदि किसी ने दुर्भावनापूर्ण मंशा से फर्जी सर्पदंश प्रकरण तैयार कर शासन को नुकसान पहुंचाया है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि जांच जारी है और दोषी चाहे किसी भी स्तर का अधिकारी या कर्मचारी हो, उसे बख्शा नहीं जाएगा। इस पूरे प्रकरण ने न केवल सर्पदंश मुआवजा योजना की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि प्रशासनिक जांच प्रणाली, दस्तावेजों के सत्यापन और जवाबदेही की व्यवस्था को भी कटघरे में ला खड़ा किया है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच केवल निचले स्तर तक सीमित रहती है या पूरे तंत्र की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक जिम्मेदारों तक कार्रवाई पहुंचती है।

What's your reaction?

Related Posts