इन दिनों अंटार्कटिका जा रहे एक क्रूज शिप पर हुई कुछ रहस्यमयी मौतों के बाद ‘हंता वायरस’ (Hantavirus) अचानक सुर्खियों में आ गया है। यूं तो मेडिकल साइंस पिछले 70 सालों से इस वायरस के बारे में जानता है, लेकिन इसका एक खास म्यूटेशन वैज्ञानिकों के लिए गहरी चिंता का सबब बन गया है। इसे ‘एंडीज स्ट्रेन’ (Andes Strain) कहा जाता है। चिंता की वजह बेहद डरावनी है: इस वायरस का डेथ रेट यानी मृत्यु दर 50 फीसदी तक है और आज तक इसकी कोई वैक्सीन या इलाज मौजूद नहीं है।
क्रूज शिप की घटना: क्या है पूरा मामला?
1 अप्रैल 2026- अर्जेंटीना के उशुआया शहर से एक आलीशान क्रूज जहाज अंटार्कटिका के एक सुहाने सफर पर निकलता है। इस ‘घोस्ट शिप’ पर 23 देशों के लगभग 150 यात्री और क्रू मेंबर्स सवार थे। शुरुआत में सब कुछ एकदम परफेक्ट था- पार्टियां चल रही थीं, लोग एन्जॉय कर रहे थे। लेकिन किसी को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि समुद्र के बीचों-बीच यह सफर जल्द ही एक भयानक दुःस्वप्न में बदलने वाला है।
सफर के महज पांच दिन बाद, एक 70 साल के डच यात्री को अचानक तेज बुखार, सिरदर्द और डायरिया की शिकायत होती है। शिप के डॉक्टर इलाज शुरू करते हैं, लेकिन कुछ ही घंटों में उसे सांस लेने में भयंकर तकलीफ होने लगती है। हालत इतनी तेजी से बिगड़ती है कि 11 अप्रैल को जहाज पर ही उसकी तड़प-तड़प कर मौत हो जाती है।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 24 अप्रैल को जब जहाज अफ्रीका के पास सेंट हेलेना आइलैंड पर रुकता है, तो उस डच यात्री की पत्नी अपने पति के शव के साथ उतर जाती है। वह वहां से साउथ अफ्रीका जाती है ताकि एम्सटर्डम की फ्लाइट ले सके। लेकिन 25 अप्रैल को एयरपोर्ट पर ही वह अचानक कोलैप्स कर जाती है और अगले ही दिन उसकी भी मौत हो जाती है। इधर, समुद्र में फंसे क्रूज पर मौजूद अन्य यात्री भी एक-एक कर बीमार पड़ने लगते हैं और 2 मई को एक जर्मन महिला की भी जान चली जाती है।
एक के बाद एक हो रही इन रहस्यमयी मौतों से दहशत फैल जाती है। जब वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) की टीम जांच करती है, तो जो सच सामने आता है, वह किसी भी हॉलीवुड थ्रिलर से ज्यादा डरावना था। मौतों का कारण था- ‘हंता वायरस’।
क्या है हंता वायरस और इसका खौफनाक इतिहास?
हंता वायरस कोई नया नाम नहीं है। यह वायरसों का एक पूरा परिवार है, जो मुख्य रूप से चूहों में पनपता है। इंसानों में यह दो तरह की जानलेवा बीमारियां पैदा करता है:
HFRS (गुर्दे के सिंड्रोम के साथ रक्तस्रावी बुखार): यह मुख्य रूप से एशिया और यूरोप में देखा जाता है। इसमें मरीज की किडनी फेल हो जाती है और शरीर के अंदर ब्लीडिंग शुरू हो जाती है।
HPS (हंता वायरस पल्मोनरी सिंड्रोम): यह नॉर्थ और साउथ अमेरिका में फैलता है। इसमें मरीज के फेफड़ों में पानी भर जाता है, जिससे उसे सांस लेने में तकलीफ होती है और अंततः घुटन से मौत हो जाती है। इसका मृत्यु दर 50% तक है, यानी हर दो में से एक संक्रमित व्यक्ति की जान जा सकती है।
इस वायरस का पहला बड़ा आउटब्रेक 1950 के कोरियन युद्ध के दौरान दिखा था, जब 3000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक रहस्यमयी तरीके से बीमार पड़ गए थे। वहीं 1993 में अमेरिका की ‘नावाहो’ आदिवासी जनजाति के कई स्वस्थ युवाओं की अचानक मौत ने दुनिया को चौंका दिया था। आदिवासियों की पुरानी कहानियों और विज्ञान के मेल से तब यह खुलासा हुआ था कि भारी बारिश (एल नीनो के कारण) से चूहों का खाना बढ़ता है, चूहों की आबादी तेजी से बढ़ती है और फिर यह वायरस इंसानों में फैलता है।
‘एंडीज़ स्ट्रेन’: हंता वायरस का सबसे खतरनाक और बागी रूप
आमतौर पर हंता वायरस चूहों के मल-मूत्र और लार से इंसानों में फैलता है। इसके अलग-अलग वेरिएंट्स शरीर के अलग-अलग अंगों पर हमला करते हैं। एशिया और यूरोप में मिलने वाला वायरस किडनी फेलियर (HFRS) का कारण बनता है, जबकि अमेरिकी महाद्वीपों में पाया जाने वाला वेरिएंट सीधे फेफड़ों पर अटैक करता है (HPS), जिससे मरीज के फेफड़ों में पानी भर जाता है और घुटन से मौत हो जाती है।
सालों तक वैज्ञानिकों का मानना था कि यह वायरस केवल चूहों के संपर्क में आने से इंसानों में आता है, इंसान से इंसान में नहीं। लेकिन 1996 में अर्जेंटीना में आए एक आउटब्रेक ने यह थ्योरी पलट दी। वैज्ञानिकों ने ‘एंडीज स्ट्रेन’ की पहचान की- यह हंता फैमिली का इकलौता ऐसा स्ट्रेन है जो ह्यूमन-टू-ह्यूमन ट्रांसमिशन यानी इंसान से इंसान में फैलाव की क्षमता रखता है। क्रूज पर हुई मौतों के पीछे भी इसी बागी स्ट्रेन का हाथ था। वैज्ञानिक रिसर्च में यह भी सामने आया है कि इस स्ट्रेन से संक्रमित कुछ लोग ‘सुपर स्प्रेडर’ बन जाते हैं, जो तेजी से कई लोगों को संक्रमित कर सकते हैं।
क्रूज पर कैसे पहुंचा यह वायरस और कैसे फैलता है?
राहत की बात यह है कि कोविड-19 या फ्लू की तरह यह हवा में नहीं फैलता। ‘एंडीज स्ट्रेन’ के एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलने के लिए बहुत ही करीबी और लंबे समय तक शारीरिक संपर्क की जरूरत होती है। जैसे- एक ही बिस्तर शेयर करना, मरीज के बॉडी फ्लूइड्स के संपर्क में आना या किसी संक्रमित की बहुत करीब से देखभाल करना।
यही वजह है कि यह ज्यादातर परिवार के सदस्यों या देखभाल करने वालों के बीच फैलता है। इसकी ‘ट्रांसमिशन विंडो’ (फैलने का समय) बहुत छोटी होती है। बीमारी की शुरुआत में यह सिर्फ एक दिन के लिए फैलता है।
क्रूज के मामले में जांच से पता चला कि मरने वाला डच कपल मार्च में उशुआया में एक ‘बर्ड वाचिंग टूर’ पर गया था। वहां वे अनजाने में एक ऐसे लैंडफिल (कचरे के ढेर) में चले गए, जहां बहुत सारे चूहे थे। इत्तेफाक से, संक्रमित होने के ठीक बाद (उसी एक दिन की ट्रांसमिशन विंडो के दौरान) वे क्रूज पर सवार हो गए और वहां अपने करीबी लोगों में यह संक्रमण फैला दिया।
बचाव का तरीका क्या है?
चूंकि इस वायरस से लड़ने के लिए कोई एंटी-वायरल दवा या वैक्सीन नहीं है, इसलिए बचाव ही इसका इकलौता हथियार है। हेल्थ एक्सपर्ट्स इसके लिए कुछ बुनियादी बातों पर जोर देते हैं:
चूहों की नो-एंट्री: अपने घरों और स्टोरेज रूम्स को इस तरह सील करें कि चूहे अंदर न आ सकें।
सख्त हाइजीन: घर में या आसपास खाने-पीने की चीजें या कूड़ा खुला न छोड़ें। कचरे का सही तरीके से निपटान करें।
प्रोटेक्शन गियर्स: अगर आपको किसी पुराने बंद कमरे, गोदाम या ऐसी जगह जाना पड़े जहां चूहों के मल-मूत्र मौजूद हो सकते हैं, तो वहां जाने से पहले N95 मास्क और ग्लव्स जरूर पहनें।
हंता वायरस भले ही रोज न्यूज हेडलाइंस में न आता हो, लेकिन यह एक ऐसा साइलेंट थ्रेट है जो खामोशी से शिकार करता है। ऐसे में सही जानकारी और जागरूकता ही इस जानलेवा बीमारी को दूर रखने का सबसे कारगर तरीका है।



















