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पितृ पक्ष में श्राद्ध करना क्यों माना जाता है जरूरी? जानें क्या कहती है धार्मिक मान्यता

हिंदू धर्म में पितृ पक्ष अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। हिंदू कैलेंडर के अनुसार श्राद्ध पक्ष भाद्रपद माह की पूर्णिमा से लेकर आश्विन माह की अमावस्या तिथि तक रहते हैं। पितृ पक्ष की कुल अवधि 16 दिनों की होती है। शास्त्रों के अनुसार, पितृ पक्ष में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से व्यक्ति पितृ ऋण और दोष से मुक्त होता है और पूर्वजों की आत्मा को शांति और मुक्ति मिलती है। मान्यता है कि पितृ पक्ष के 16 दिनों में यमराज पितरों की आत्माओं को मुक्त कर देते हैं, जिससे वे सूक्ष्म रूप में पृथ्वी पर अपने परिजनों के बीच आते हैं। इस समय श्राद्ध कर्म से प्रसन्न होकर वे अपने वंशजों को सुख, समृद्धि और खुशहाली का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इस बार पितृ पक्ष 26 सितंबर से प्रारंभ हो रहे हैं और इनका समापन 10 अक्टूबर को होगा। यहां पौराणिक कथा से जानें पितृ पक्ष में श्राद्ध करना क्यों जरूरी होता है?

दानवीर कर्ण से जुड़ी पौराणिक कथा:

महाभारत के अनुसार, जब दानवीर कर्ण की मृत्यु के बाद उनकी आत्मा स्वर्ग पहुंची, तो उन्हें भोजन के स्थान पर सोना-चांदी और आभूषण परोसे गए। कर्ण ने जब इसका कारण पूछा, तो इंद्रदेव ने बताया कि उन्होंने जीवनभर सोना और धन तो दान किया, लेकिन कभी अपने पितरों को अन्न और जल समर्पित नहीं किया।

कर्ण ने कहा कि उन्हें अपने पूर्वजों का ज्ञान नहीं था। इसके बाद इंद्रदेव ने कर्ण को 16 दिनों के लिए पुनः पृथ्वी पर लौटने की अनुमति दी, ताकि वे अपने पूर्वजों के नाम से अन्न और जल का दान कर सकें। इन्हीं 16 दिनों की अवधि को आगे चलकर पितृ पक्ष कहा गया।

महाभारत में वर्णित है कथा:

तर्पण श्राद्ध से जुड़ा एक प्रसंग महाभारत के 13वें अध्याय में वर्णित है जो कि जरत्कारु ऋषि का है। प्रसंग के अनुसार, जरत्कारु ऋषि ब्रह्मचर्य जीवन बिताते हुए जंगल में तपस्या कर रहे थे। एक दिन शाम को वन में घूमते समय उन्हें पेड़ पर कुछ पितृ गण उलटा टंगे दिखाई दिए। तब ऋषि ने उन पितरों के पास जाकर पूछा कि वह लोग कौन हैं और इस तरह से उलटा क्यों टंगे हैं। उनकी मुक्ति का क्या उपाय है। तब पितरों ने बताया कि हमारे कुल, खानदान में वंश परंपरा समाप्त होने के कारण कोई नहीं बचा है जो हम सभी पितरों का पितृ पक्ष में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान कर मुक्ति दिला सके।

पितरों ने कहा कि उनके खानदान में एक ही व्यक्ति बचा है जो ब्रह्मचर्य जीवन बिता रहा है उसका नाम जरत्कारु है। यह सुनकर जरत्कारु ऋषि को बहुत दुख हुआ और बोलें कि वह अभागा जरत्कारु ऋषि वह ही हैं। इतना सुनते ही पितृ गण प्रसन्न हो गए और बोले की बड़े सौभाग्य की बात है कि आप से मुलाकात हो गई। पितरों ने कहा कि अगर आप हम सभी को मुक्ति दिलाना चाहते हैं तो अतिशीघ्र विवाह करें और अपने कुल में वंश की वृद्धि करें और पितृ पक्ष के अवसर पर खानदान के सभी स्वर्गवासी पितृ गणों के नाम से श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण करें जिससे सभी को मुक्ति मिल सके।

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