बिलासपुर। स्थानीय निकायों में लंबे समय से चली आ रही ‘पार्षद पति’ संस्कृति पर राज्य सरकार के नए फैसले से बिलासपुर की शहरी राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। छत्तीसगढ़ नगरपालिका नियम, 2022 में किए गए संशोधन के बाद अब महिला जनप्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पति या अन्य परिजनों के अनधिकृत हस्तक्षेप पर रोक लगाने की व्यवस्था की गई है। इसका सीधा असर बिलासपुर नगर निगम की 29 महिला पार्षदों पर पड़ने की संभावना है। महापौर पद भी महिला के पास होने के कारण इस बदलाव का प्रभाव निगम की कार्यप्रणाली और राजनीतिक समीकरणों पर व्यापक हो सकता है।
नए प्रावधान का मूल उद्देश्य यही है कि जनता ने जिस महिला प्रतिनिधि को चुनकर भेजा है, वार्ड का प्रतिनिधित्व और उससे जुड़े निर्णय वही लें। बैठकों, अधिकारियों से संवाद, विकास कार्यों की निगरानी और वार्ड की समस्याओं को निगम प्रशासन के सामने रखने की जिम्मेदारी अब निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की ही होगी।
अब खुद संभालना होगा वार्ड
नियम के प्रभावी होने के बाद उन महिला पार्षदों के लिए चुनौती बढ़ सकती है, जो अब तक वार्ड से जुड़े कामकाज में पति या परिवार के अन्य सदस्यों की मदद पर अधिक निर्भर रही हैं। उन्हें अधिकारियों, निगम कर्मचारियों और ठेकेदारों से सीधे संवाद करना होगा।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शुरुआती दौर में कुछ वार्डों में कामकाज की गति प्रभावित हो सकती है। हालांकि, लंबे समय में यह व्यवस्था महिला पार्षदों को स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने का अवसर भी दे सकती है।
समर्थकों का तर्क-महिलाओं को मिलेगा स्वतंत्र नेतृत्व
सरकार के फैसले के समर्थन में सबसे बड़ा तर्क महिला सशक्तिकरण का है। समर्थकों का कहना है कि चुनाव जनता ने महिला प्रतिनिधि को जिताया है, इसलिए वार्ड का नेतृत्व भी उसी के हाथ में होना चाहिए।
इस व्यवस्था के समर्थकों के प्रमुख तर्क हैं कि
• ‘पार्षद पति’ संस्कृति पर प्रभावी रोक लगेगी।
• निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों को स्वतंत्र निर्णय लेने का अवसर मिलेगा।
• निगम की बैठकों और सरकारी कामकाज में अनधिकृत हस्तक्षेप कम होगा।
• महिला पार्षदों की वास्तविक राजनीतिक क्षमता और नेतृत्व सामने आएगा।
• पद से जुड़े अधिकार और कानूनी जवाबदेही सीधे निर्वाचित प्रतिनिधि की होगी।
विरोध में तर्क-परिवार का सहयोग और अनधिकृत दखल अलग
दूसरी ओर, इस व्यवस्था को लेकर कुछ महिला जनप्रतिनिधियों के बीच व्यावहारिक चुनौतियों की चर्चा भी है। तर्क दिया जा रहा है कि घरेलू या गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि से आने वाली नई महिला पार्षदों के लिए प्रशासनिक प्रक्रिया और निगम के कामकाज को समझने में परिवार का सहयोग उपयोगी हो सकता है।
विरोध में उठाए जा रहे प्रमुख सवाल हैं
• नई महिला नेताओं को प्रशासनिक प्रक्रिया समझने में समय लगेगा।
• परिवार का सहयोग पूरी तरह खत्म होने से वार्ड के काम प्रभावित हो सकते हैं।
• पर्दे के पीछे से होने वाले अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप को रोकना प्रशासन के लिए चुनौती होगा।
• सख्त व्यवस्था के कारण कुछ महिलाएं स्थानीय राजनीति में आने से हिचक सकती हैं।
• पारिवारिक सहयोग और अनधिकृत राजनीतिक हस्तक्षेप के बीच अंतर करना जरूरी है।
बिलासपुर में 29 महिला पार्षद
बिलासपुर नगर निगम में महिला पार्षदों की संख्या इस बदलाव के प्रभाव को महत्वपूर्ण बनाती है। महिला पार्षदों वाले वार्डों में वार्ड प्रबंधन, निगम अधिकारियों से समन्वय और राजनीतिक गतिविधियों में अब निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका और अधिक प्रत्यक्ष होगी। महिला पार्षदों वाले वार्डों में साई नगर, गोकुलनगर, डॉ. खूबचंद बघेल वार्ड, यदुनंदननगर, चित्रकांत नगर, संत कबीरदास, विष्णुनगर, तिलकनगर, भक्त कंवर रामनगर, गुरु घासीदास नगर, मदर टेरेसा नगर, क्रांतिवीर कुमार भारतीय नगर, शहीद असफाक उल्लानगर, विनोबानगर, लाला लाजपत राय नगर, संत रविदास नगर, इंदिरा नगर, तात्याटोपे नगर, शंकरनगर, कमला नेहरू नगर, भक्तमाता कर्मा नगर, माता परमेश्वरी नगर, विजयनगर, अशोकनगर, रानी दुर्गावती नगर, शहीद मंगल पाण्डेय नगर, शास्त्री नगर, विद्यासागर नगर और रामकृष्ण परमहंस नगर शामिल हैं।
महापौर ने बताया महिला स्वावलंबन की दिशा में जरूरी कदम
बिलासपुर की महापौर पूजा विधानी ने इस फैसले को महिला स्वावलंबन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। उनका कहना है कि जनता ने जिस प्रतिनिधि को चुना है, उसे ही निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। निर्वाचित महिला के स्थान पर उसके परिजनों को राजनीतिक या प्रशासनिक प्रभाव दिखाने का अवसर नहीं मिलना चाहिए।
पार्षदों की राय में व्यावहारिक पहलू भी अहम
वहीं पार्षद गायत्री लक्ष्मी साहू का तर्क है कि भारतीय सामाजिक परिवेश में घरेलू पृष्ठभूमि से आने वाली महिलाओं के लिए परिवार का सहयोग महत्वपूर्ण होता है। उनका मानना है कि अचानक कड़े प्रतिबंध लागू करने से कुछ महिला प्रतिनिधियों का मनोबल प्रभावित हो सकता है।
पार्षद रेखा ओमप्रकाश पाण्डेय का कहना है कि आधिकारिक निर्णय लेने और व्यावहारिक सहयोग के बीच अंतर किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, जमीनी समस्याओं के समाधान में परिवार के सदस्यों का सहयोग कई बार जनता के हित में उपयोगी होता है।
असली परीक्षा अब जमीन पर
सरकार के फैसले के बाद बिलासपुर में असली परीक्षा इस बात की होगी कि महिला पार्षद कितनी मजबूती से खुद वार्ड की कमान संभालती हैं। यदि व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है तो इससे ‘पार्षद पति’ संस्कृति कमजोर होने के साथ महिला पार्षदों की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान मजबूत हो सकती है। दूसरी ओर, प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि परिवार के स्वाभाविक सहयोग और निर्वाचित पद में अनधिकृत हस्तक्षेप के बीच स्पष्ट सीमा बनी रहे।


















