रायपुर/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में वन एवं पर्यावरण संरक्षण को लेकर राज्य सरकार के फैसले पर हाईकोर्ट ने मुहर लगा दी है। अदालत ने उन सभी 19 याचिकाओं को खारिज कर दिया है, जिनमें वन एवं संरक्षित क्षेत्रों के 10 किलोमीटर के दायरे को निषिद्ध क्षेत्र घोषित करने संबंधी राज्य सरकार की अधिसूचना को चुनौती दी गई थी।
राज्य सरकार ने 25 सितंबर 2025 को छत्तीसगढ़ काष्ठ चिरान (विनियमन) अधिनियम, 1984 की धारा 5(1) के तहत अधिसूचना जारी कर वन एवं संरक्षित क्षेत्रों से 10 किलोमीटर (एयर डिस्टेंस) के भीतर आरा मिलों के संचालन पर तीन वर्ष के लिए रोक लगाने का निर्णय लिया था।
इस अधिसूचना के खिलाफ प्रदेशभर के आरा मिल संचालकों ने हाईकोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं। उनका तर्क था कि वे वर्षों से वैध लाइसेंस के साथ कारोबार कर रहे हैं तथा वर्ष 1996 से पहले स्थापित आरा मिलों को इस प्रतिबंध से छूट मिलनी चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने राज्य स्तरीय समिति की पुरानी सिफारिशों का हवाला देते हुए 10 किलोमीटर की सीमा को मनमाना भी बताया था।
सुनवाई के दौरान राज्य और केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि यह निर्णय पर्यावरण संरक्षण, वन संपदा की सुरक्षा और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से लिया गया है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि पर्यावरण संरक्षण और वनों की रक्षा करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है तथा निजी व्यावसायिक हितों को सार्वजनिक हित से ऊपर नहीं रखा जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि नीतिगत निर्णयों में न्यायालय तभी हस्तक्षेप कर सकता है, जब वे कानून के विरुद्ध या पूरी तरह मनमाने हों।
कोर्ट ने माना कि वन एवं संरक्षित क्षेत्रों के आसपास 10 किलोमीटर का निषिद्ध दायरा एक सुरक्षात्मक मानक है और राज्य सरकार को अधिनियम की धारा 5 के तहत ऐसे क्षेत्र घोषित करने का वैधानिक अधिकार प्राप्त है। इसलिए विशेषज्ञ समिति की पुरानी सिफारिशों के आधार पर इस अधिसूचना को चुनौती नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट के इस फैसले के साथ राज्य सरकार का निर्णय बरकरार रहेगा और संरक्षित वन क्षेत्रों के 10 किलोमीटर के दायरे में आरा मिलों के संचालन पर लागू प्रतिबंध प्रभावी रहेगा।


















