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केंद्र ने ‘लू’ को प्राकृतिक आपदा घोषित किया, अब मिलेगा मुआवजा; जानें क्या बदलेगा

देश में लगातार बढ़ते तापमान और भीषण गर्मी के प्रभाव को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय लिया है। केंद्र ने लू (हीटवेव) को अब ‘अधिसूचित प्राकृतिक आपदा’ (Notified Natural Calamity) के रूप में मान्यता दे दी है। इस फैसले को जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच राहत और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यह निर्णय उन करोड़ों लोगों के लिए राहत की उम्मीद लेकर आया है जो हर वर्ष भीषण गर्मी और लू की चपेट में आते हैं। विशेष रूप से दिहाड़ी मजदूर, निर्माण कार्यों में लगे श्रमिक, खेतिहर मजदूर, झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले परिवार, बुजुर्ग, बच्चे और अन्य संवेदनशील वर्ग गर्मी के गंभीर प्रभावों का सामना करते हैं।

राज्यों को मिलेगी राहत कार्यों के लिए अतिरिक्त मदद

हीटवेव को अधिसूचित प्राकृतिक आपदा का दर्जा मिलने के बाद राज्य सरकारें गर्मी से बचाव और राहत कार्यों के लिए विशेष केंद्रीय आपदा राहत फंड का उपयोग कर सकेंगी। इससे प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल, अस्थायी शीतलन केंद्र, स्वास्थ्य सेवाएं, जन-जागरूकता अभियान और अन्य राहत उपायों को अधिक प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय उन राज्यों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगा जहां हर साल तापमान नए रिकॉर्ड बनाता है और बड़ी आबादी लू की चपेट में आती है।

4 अगस्त को भारत ने लू और बिजली गिरने की घटना को प्राकृतिक आपदा घोषित किया। यानी पहले से मौजूद 12 अधिसूचित प्राकृतिक आपदाओं की सूची में लू और बिजली गिरने की घटना को भी शामिल कर लिया गया है, जिससे यह सूची 14 आपदाओं की हो गई। शमन कोष के दिशा-निर्देशों में 2024 में किए गए संशोधन के साथ, इस कदम से लू पूरी तरह से भारत के आपदा फ़ाइनेंसिंग सिस्टम के दायरे में आ गई है। इससे पहले जून 2026 में, गृह मंत्रालय ने 2026 से 2031 तक की अवधि के लिए राज्य और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष के लिए नए ऑपरेशनल दिशा-निर्देश जारी किए थे। इससे पहले तक अधिसूचित प्राकृतिक आपदाओं की लिस्ट में भूकंप, बाढ़, सूखा, सुनामी, चक्रवात या तूफान, भूस्खलन, कीड़ों का हमला, जंगल की आग, हिमस्खलन, शीतलहर या पाला, बादल फटना और ओलावृष्टि शामिल था।

फंडिंग का खुला रास्ता: अब जमीनी स्तर पर दिखेगा ठोस काम

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के प्रमुख कृष्ण एस. वत्सा ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि हाल के दिनों में हीटवेव एक बेहद गंभीर खतरे के रूप में उभरी है। इसलिए सरकार के लिए जरूरी है कि वह लॉन्ग टर्म को ध्यान में रखते हुए इस पर काम करे और ज़रूरी संसाधन मुहैया कराए। वत्सा ने बताया, “एक बार आपदा के तौर पर घोषित होने के बाद, राज्य सरकारें बिजली गिरने और लू यानी दोनों से निपटने और उनके असर को कम करने के लिए ‘स्टेट डिज़ास्टर रिस्पॉन्स फंड’ (SDRF) और ‘स्टेट डिज़ास्टर मिटिगेशन फंड’ (SDMF) का इस्तेमाल कर पाएँगे। चूँकि हाल के समय में ये समस्याएँ तेज़ी से बढ़ी हैं, इसलिए सभी स्तरों पर सरकार के लिए जरूरी है कि वह पर्याप्त संसाधनों के साथ लंबे समय के लिए इनका समाधान करे। यह एक ऐसा कदम होगा जिसका लंबे समय तक सकारात्मक असर पड़ेगा।”

फंड जुटाना होगा आसान

उन्होंने आगे कहा, “अब तक, इस पर प्रतिक्रिया ज़्यादातर योजनाओं, रूपरेखाओं और जागरूकता तक ही सीमित रही है; अब ज़मीनी स्तर पर ठोस उपायों की ज़रूरत है, और यह फंड आवंटन ठीक इसी काम के लिए संसाधन तय करने का एक अच्छा मौका देता है।” योजना कैसे काम करेगी, इस बारे में बताते हुए वत्सा ने कहा कि सरकार की फंडिंग ‘सीड मनी’ (शुरुआती पूंजी) की तरह काम करती है। यह एक शुरुआती मदद है जो शहरों को ‘हीट एक्शन प्लान’ (HAP) बनाने में मदद करती है, जिससे नागरिकों, CSR और दूसरी योजनाओं से अतिरिक्त फंड जुटाना आसान हो जाता है।

हीट एक्शन प्लान लागू करने में होगी सुविधा

वत्सा ने कहा, “अगर कोई शहर या शहरी आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, या नगर निगम ‘कूलिंग शेल्टर’ बनाना चाहता है, ज़्यादा पानी के पॉइंट बनाना चाहता है, या सार्वजनिक जगहों पर गर्मी से राहत देने वाली सुविधाएँ बेहतर करना चाहता है, तो इन संसाधनों का इस्तेमाल ऐसे कामों में किया जा सकता है। यह एक शुरुआती मदद की तरह काम करता है, जिसका इस्तेमाल करके दूसरे स्रोतों से और संसाधन जुटाए जा सकते हैं।” उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन और नगर निगम स्थानीय स्तर पर HAP लागू करने और यह तय करने के लिए ज़िम्मेदार हैं कि संसाधन कहाँ से जुटाए जाएँ और कहाँ निवेश किए जाएँ। वत्सा ने कहा, “मुझे उम्मीद है कि इससे अगले पांच सालों में और ज़्यादा HAP (हीट एक्शन प्लान) और स्थानीय उपाय लागू होंगे, साथ ही तापमान बढ़ने के पीछे के जलवायु संबंधी कारणों को भी बेहतर ढंग से समझा जाएगा।”

बजट की पुरानी बाधाएं हुईं खत्म

‘काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर’ (CEEW) के संस्थापक-सीईओ अरुणाभ घोष ने इस फैसले के वित्तीय महत्व को समझाते हुए एक बड़ी बात बताई। उन्होंने कहा कि पहले कोई भी राज्य अपने स्तर पर हीटवेव को आपदा घोषित तो कर सकता था, लेकिन वे SDRF के केवल 10 प्रतिशत और SDMF के केवल 20 प्रतिशत फंड का ही इस्तेमाल कर पाते थे। केंद्र की इस नई अधिसूचना ने इस वित्तीय सीमा और नीतिगत अस्पष्टता को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है।

जमीनी स्तर पर क्या बदलाव दिखेंगे?

इस सरकारी फंड का उपयोग शहरों और जिलों में ‘हीट एक्शन प्लान’ (HAPs) को लागू करने के लिए ‘सीड मनी’ (प्रारंभिक सहायता राशि) के तौर पर किया जाएगा। स्थानीय प्रशासन इस राशि का उपयोग करके कूलिंग शेल्टर (ठंडे आश्रय स्थल) का निर्माण कर सकेंगे। सार्वजनिक स्थानों पर पीने के पानी के नए केंद्र स्थापित कर सकेंगे। सार्वजनिक क्षेत्रों में थर्मल आराम (Thermal Comfort) और छांव की व्यवस्था कर सकेंगे। ितना ही नहीं, इस सरकारी मदद के जरिए कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) और अन्य योजनाओं से अतिरिक्त फंड आकर्षित किया जा सकेगा। इससे गरीबों, दिहाड़ी मजदूरों, राहगीरों को बड़ी राहत मिलेगी।

स्वास्थ्य प्रणाली का सुदृढ़ीकरण होगा

एम्स (AIIMS) दिल्ली के चिकित्सक डॉ. हर्षल रमेश साल्वे ने जोर देकर कहा कि हीटवेव के असर को रोकना और इलाज करना बहुत कठिन नहीं है, इसके लिए केवल प्राथमिकता और संवेदनशील लोगों की पहचान की जरूरत है। उन्होंने बताया कि बीमारी के कारण गरीबों पर होने वाले भारी खर्च को रोकने के लिए अगर सरकारी पुनर्वास और वित्तीय सहायता दी जाए, तो इससे देश के आर्थिक और स्वास्थ्य ढांचे दोनों को मजबूती मिलेगी।

राष्ट्रीय और राज्य नीतियों का तालमेल दिखेगा

‘नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल’ (NRDC) के अभियंत तिवारी ने इस कदम की तुलना कोविड-19 महामारी से की। उन्होंने कहा कि आपदा घोषित होने से पूरी प्रणाली एकजुट और समन्वित होकर काम करती है। यह कानूनी अधिसूचना अब हीट एक्शन प्लान को राष्ट्रीय स्तर पर नीतिगत, कानूनी और वित्तीय (SDRF, NDRF, SDMF, NDMF के जरिए) ताकत देगी। चूंकि, भारत एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है जहां बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य चल रहा है और कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा खुले आसमान के नीचे काम करता है। ऐसे में यह कदम असंगठित क्षेत्र के कामगारों को सीधा फायदा पहुंचा सकता है।

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