छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मृतक कर्मचारियों के परिजनों के हित में एक जरूरी फैसला सुनाया है. हाई कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि किसी कर्मचारी की मौत के बाद उसके परिवार को दी जाने वाली सहायता राशि (मुआवजा) की गणना किसी पुरानी या काल्पनिक वेतन सीमा के आधार पर नहीं की जा सकती. कोर्ट के अनुसार, कर्मचारी अपनी मृत्यु के समय वास्तव में जो वेतन पा रहा था, उसी ‘एक्चुअल सैलरी’ को मुआवजे का आधार बनाया जाना चाहिए. इस फैसले से उन हजारों परिवारों को फायदा होगा जिन्हें अब तक नियमों की जटिलता के कारण कम मुआवजा मिल रहा था.
क्या है पूरा मामला?
- जस्टिस बिभू दत्ता गुरु की सिंगल जज बेंच ने कहा कि किसी कर्मचारी की मौत के बाद उसके परिवार को मिलने वाला मुआवजा पुराने तय वेतन सीमा के आधार पर नहीं, बल्कि उसके वास्तविक (असल) वेतन के अनुसार तय किया जाना चाहिए.
- दरअसल, मामला जगदलपुर के ट्रक ड्राइवर सत्येंद्र सिंह से जुड़ा है, जिसकी 15 दिसंबर 2017 को सड़क हादसे में मौत हो गई थी। इसके बाद उसकी पत्नी, बच्चों और मां ने मुआवजे के लिए दावा किया था.
हाई कोर्ट गई थी बीमा कंपनी
लेबर कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए ड्राइवर की मासिक आय 9,880 रुपये मानी और करीब 9.49 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था, लेकिन बीमा कंपनी ने इस फैसले को चुनौती दी. बीमा कंपनी का कहना था कि केंद्र सरकार के नियमों के अनुसार अधिकतम वेतन 8,000 रुपये ही माना जाना चाहिए.



















