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पंचायत कर्मचारियों को नहीं मिलेगा पेंशन लाभ, हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पंचायतों के सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन दिए जाने की मांग से जुड़ी याचिकाओं को खारिज कर दिया है। जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई वैधानिक प्रावधान या पेंशन योजना नहीं बता सके, जिसके आधार पर उन्हें पेंशन पाने का स्वतंत्र अधिकार प्राप्त हो।

अदालत ने स्पष्ट किया कि पंचायत कर्मचारी शासकीय कर्मचारी नहीं हैं। उनके नियुक्ति और सेवा संबंधी मामलों के लिए पंचायतों के अलग भर्ती एवं सेवा नियम लागू होते हैं। ऐसे में सरकारी कर्मचारियों के लिए लागू पेंशन व्यवस्था का लाभ पंचायत कर्मचारियों को स्वतः नहीं दिया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि पेंशन का दावा तभी किया जा सकता है, जब उसके लिए कोई स्पष्ट वैधानिक प्रावधान या लागू पेंशन योजना मौजूद हो। संबंधित याचिकाओं में ऐसा कोई आधार प्रस्तुत नहीं किया जा सका। इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने पंचायतों के सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन संबंधी मांग वाली याचिकाएं खारिज कर दीं।

कोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 की धारा 131 केवल पहले से उपलब्ध वेतन, भत्ते, पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों को संरक्षण देने वाली व्यवस्था है. यह ऐसा नया पेंशन अधिकार पैदा नहीं करती, जो संबंधित कर्मचारी को पहले से प्राप्त ही नहीं था. याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति के समय लागू सेवा शर्तों में सेवानिवृत्ति लाभों के लिए भविष्य निधि योजना का प्रावधान था. साथ ही, याचिकाकर्ता अंशदायी भविष्य निधि का लाभ लेने की बात से भी इनकार नहीं कर सके.

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि कुछ अन्य जनपद पंचायतों में कर्मचारियों को पेंशन दी जा रही है. इस पर राज्य की ओर से बताया गया कि गुंडरदेही और तखतपुर जनपद पंचायतों में कुछ कर्मचारियों को स्थानीय स्तर पर गठित पेंशन निधि से भुगतान किया जा रहा है. यह भुगतान किसी राज्य स्तरीय वैधानिक पेंशन योजना के तहत नहीं है. संबंधित अधिकारियों को इस भुगतान के आधार को लेकर कारण बताओ नोटिस भी जारी किए जा चुके हैं.

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी अन्य प्राधिकरण द्वारा किए गए ऐसे भुगतान से सभी समान रूप से स्थित पंचायत कर्मचारियों को वैधानिक पेंशन का अधिकार नहीं मिल सकता. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका कानून बनाने या सरकार को किसी विशेष नीति को अपनाने का निर्देश नहीं दे सकती.

मामले में दंतेवाड़ा, बस्तर, रायगढ़, बीजापुर, मुंगेली, धमतरी, सक्ती, कांकेर, दुर्ग, सुकमा और अन्य जिलों से जुड़े कुल 20 से अधिक याचिकाकर्ताओं ने पेंशन से इनकार संबंधी आदेशों को चुनौती दी थी. सभी याचिकाओं में समान कानूनी प्रश्न होने के कारण हाईकोर्ट ने उन्हें एक साथ सुनवाई कर खारिज कर दिया.

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