बिलासपुर। बहुचर्चित फर्जी कार्डियोलॉजिस्ट मामले में थाना सरकंडा पुलिस ने अपोलो अस्पताल प्रबंधन और चयन समिति की भूमिका की जांच पूरी कर न्यायालय में क्लोजर रिपोर्ट पेश कर दी है। पुलिस जांच में अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र या जानबूझकर नियुक्ति करने के पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने की बात कही गई है। हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अस्पताल प्रबंधन की प्रशासनिक और संस्थागत जवाबदेही समाप्त नहीं होती।
पुलिस ने स्पष्ट किया है कि मुख्य आरोपी डॉ. नरेंद्र विक्रमादित्य यादव उर्फ नरेंद्र जॉन कैम के खिलाफ फर्जी दस्तावेजों के आधार पर चिकित्सकीय कार्य करने सहित विभिन्न गंभीर धाराओं में कार्रवाई पहले से जारी है। वहीं अस्पताल प्रबंधन और चयन समिति के विरुद्ध साक्ष्यों के अभाव में क्लोजर रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की गई है।
रिकॉर्ड नष्ट होने के दावे पर उठे सवाल
जांच के दौरान अपोलो अस्पताल प्रबंधन ने पुलिस को बताया कि संबंधित नियुक्ति 17-18 वर्ष पुरानी है और उस समय के दस्तावेज रिकॉर्ड संरक्षण अवधि पूरी होने के बाद नष्ट कर दिए गए। लेकिन इस दावे पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अस्पताल को यह स्पष्ट करना होगा कि रिकॉर्ड नष्ट करने की नीति क्या थी, रिकॉर्ड कब और किस अधिकारी के आदेश पर नष्ट किए गए तथा क्या इसकी कोई आधिकारिक कार्यवाही या दस्तावेज मौजूद हैं।
क्लोजर रिपोर्ट को क्लीन चिट नहीं माना जा सकता
कानूनी जानकारों के अनुसार क्लोजर रिपोर्ट का अर्थ यह नहीं है कि अस्पताल प्रबंधन पूरी तरह निर्दोष घोषित हो गया है। रिपोर्ट में केवल इतना कहा गया है कि उपलब्ध साक्ष्यों से आपराधिक मंशा या षड्यंत्र सिद्ध नहीं हो सका। ऐसे में संस्थागत लापरवाही और प्रशासनिक जिम्मेदारी जैसे सवाल अभी भी बने हुए हैं।
नियुक्ति प्रक्रिया पर गंभीर सवाल
जांच में स्वयं यह सामने आया कि आरोपी चिकित्सक के दस्तावेज संदिग्ध थे। उसका विशेषज्ञ पंजीयन प्रमाणित नहीं हुआ और उसकी एमबीबीएस डिग्री पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगे। इसके बावजूद वह वर्षों तक अस्पताल में कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में कार्य करता रहा और मरीजों का इलाज करता रहा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि नियुक्ति के समय दस्तावेजों का सत्यापन किया गया था तो उसका रिकॉर्ड उपलब्ध होना चाहिए था। यदि ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है तो यह अस्पताल की नियुक्ति प्रक्रिया और आंतरिक निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
कई संस्थानों से जुटाई गई जानकारी
पुलिस विवेचना के दौरान मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल, उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज, अपोलो अस्पताल और मध्यप्रदेश के दमोह पुलिस सहित कई संस्थानों से जानकारी जुटाई गई।
जांच में सामने आया कि आरोपी ने स्वयं को एमबीबीएस, एमआरसीपी और इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी में फेलोशिप धारक बताया था, लेकिन मेडिकल काउंसिल से उसका वैध विशेषज्ञ पंजीयन प्रमाणित नहीं हुआ। उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज से भी उसके नाम पर वैध एमबीबीएस डिग्री का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं मिला।
इसके अलावा दमोह में दर्ज प्रकरण में आरोपी द्वारा नरेंद्र जॉन कैम नाम से फर्जी आधार कार्ड, पैन कार्ड और अन्य दस्तावेज तैयार कराने की बात भी जांच में सामने आई।
आरोपी ने स्वीकार किया अस्पताल में किया था इलाज
प्रोडक्शन वारंट पर बिलासपुर लाकर पूछताछ के दौरान आरोपी ने अपोलो अस्पताल में कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में कार्य करने तथा अनेक मरीजों की एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी करने की बात स्वीकार की। हालांकि वह अपनी चिकित्सकीय योग्यता से संबंधित वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका।
अब इस मामले में अदालत के समक्ष पेश क्लोजर रिपोर्ट पर न्यायिक निर्णय महत्वपूर्ण होगा। वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि आपराधिक दायित्व से अलग अस्पताल प्रबंधन की संस्थागत जवाबदेही और नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता पर आगे भी सवाल उठते रहेंगे।


















