रायपुर। जल संसाधन विभाग की बहुप्रतीक्षित पैरी दांयी तट मुख्य नहर परियोजना में बड़े वित्तीय अनियमितता के आरोप सामने आने के बाद राज्य शासन ने पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच समिति गठित कर दी है। प्रारंभिक दस्तावेजों में सामने आया है कि 53 करोड़ रुपये की स्वीकृत लागत वाली परियोजना में बिना पुनरीक्षित प्रशासकीय स्वीकृति और वित्त विभाग की अनुमति के 67.76 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया गया। यानी स्वीकृत राशि से करीब 14.74 करोड़ रुपये अधिक खर्च किए गए।
मामले की गंभीरता इस बात से और बढ़ गई है कि जिस परियोजना पर यह भुगतान किया गया, उसका कार्य करीब 18 वर्ष बाद भी पूरा नहीं हो पाया है। ऐसे में काम की प्रगति, भुगतान प्रक्रिया और विभागीय निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
2008 में मिली थी स्वीकृति
जानकारी के अनुसार गरियाबंद जिले में पैरी दांयी तट मुख्य नहर तथा फिंगेश्वर वितरक शाखा की लाइनिंग के लिए 7 जुलाई 2008 को 53 करोड़ 2 लाख रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति जारी की गई थी। लेकिन बाद के वर्षों में विभागीय अधिकारियों ने पुनरीक्षित प्रशासकीय स्वीकृति प्राप्त किए बिना ही ठेकेदारों को कुल 67 करोड़ 76 लाख रुपये का भुगतान कर दिया।
वित्तीय नियमों के अनुसार निर्धारित स्वीकृति राशि से अधिक व्यय होने पर पुनरीक्षित प्रशासकीय स्वीकृति और वित्त विभाग की मंजूरी अनिवार्य होती है। जांच में अब तक यह सामने आया है कि अतिरिक्त भुगतान के लिए न तो वित्त विभाग से अनुमति ली गई और न ही कोई वैधानिक आदेश जारी किया गया।
एमआईएस प्रणाली और अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में
शासन द्वारा जारी आदेश में संकेत दिए गए हैं कि प्रमुख अभियंता कार्यालय के अधीन संचालित एमआईएस (मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम) से जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जाएगी। आदेश में कहा गया है कि संबंधित अधिकारियों की मिलीभगत या लापरवाही के बिना इतनी बड़ी राशि का भुगतान संभव नहीं था।
जांच समिति को यह पता लगाने के निर्देश दिए गए हैं कि भुगतान की प्रक्रिया किस प्रकार पूरी हुई, एमआईएस प्रणाली में किस स्तर पर अनुमति और सत्यापन हुआ तथा किन अधिकारियों ने भुगतान को स्वीकृति दी।
18 साल बाद भी अधूरी परियोजना
मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि वर्ष 2008 में शुरू हुई परियोजना का कार्य अब तक पूरा नहीं हुआ है। फिंगेश्वर वितरक शाखा की लाइनिंग से जुड़े कई हिस्सों में काम अधूरा बताया जा रहा है। इसके बावजूद अधिकांश राशि का भुगतान कर दिया गया, जिससे विभागीय कार्यप्रणाली और वित्तीय अनुशासन पर सवाल उठ रहे हैं।
हर पहलू की होगी जांच
क्या भुगतान वित्त विभाग के नियमों के अनुरूप किया गया?
अतिरिक्त राशि किन परिस्थितियों में और किस नियम के तहत खर्च की गई?
एमआईएस प्रणाली में भुगतान प्रक्रिया के दौरान किस स्तर पर चूक हुई?
भुगतान के लिए कौन-कौन अधिकारी जिम्मेदार हैं?
क्या जल संसाधन विभाग की अन्य परियोजनाओं में भी इसी प्रकार की अनियमितताएं हुई हैं?
जांच के दौरान सामने आने वाले अन्य तथ्यों को भी रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा।
समिति में शामिल अधिकारी
संजय पाठक
जयंत कुमार बिसेन
वसुंधरा ठाकुर
हनी जैन
श्वेता खेमानी


















