बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि लिव-इन रिलेशनशिप में लंबे समय तक आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को केवल बाद में शादी से इनकार कर देने के आधार पर दुष्कर्म (रेप) नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखते हुए महिला की अपील खारिज कर दी।
जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की डिवीजन बेंच ने कहा कि यदि संबंध लंबे समय तक दोनों की सहमति और इच्छा से चले हों, तो बाद में विवाह नहीं होने मात्र से भारतीय दंड कानून के तहत दुष्कर्म का अपराध स्वतः स्थापित नहीं होता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में संबंधों की अवधि, दोनों पक्षों के व्यवहार और परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है।
कोर्ट ने कहा- बदलते सामाजिक परिवेश को समझना होगा
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि पहले जहां लिव-इन रिलेशनशिप को सामान्य नहीं माना जाता था, वहीं अब आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिलाएं अपने जीवन से जुड़े निर्णय स्वयं लेने में सक्षम हैं। इसलिए अदालतों को ऐसे मामलों में रूढ़िवादी दृष्टिकोण अपनाने के बजाय यह देखना चाहिए कि संबंध वास्तव में स्वतंत्र और वैध सहमति पर आधारित थे या नहीं।
क्या था पूरा मामला?
मामले के अनुसार करीब 40 वर्षीय महिला ने वर्ष 2019 में आईआईएम रायपुर के एमबीए कार्यक्रम में प्रवेश लिया था। पढ़ाई के दौरान उसकी पहचान एक सहपाठी से हुई। महिला का आरोप था कि 5 जुलाई 2019 को आरोपी ने पढ़ाई के बहाने उसे अपने घर बुलाया और शादी का भरोसा देकर शारीरिक संबंध बनाए।
महिला के अनुसार दोनों लंबे समय तक रिश्ते में रहे, लेकिन जब भी उसने शादी की बात की, आरोपी टालता रहा। अगस्त 2021 में आरोपी ने कथित रूप से कहा कि महिला के तलाकशुदा होने और ईसाई समुदाय से होने के कारण उसके माता-पिता विवाह के लिए तैयार नहीं हैं। इसके बाद महिला ने राज्य महिला आयोग और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को किया था बरी
पुलिस ने मामले में चालान पेश किया, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने यह मानते हुए आरोपी को बरी कर दिया कि दोनों बालिग थे और उनके बीच संबंध आपसी सहमति से बने थे। महिला ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने अपील की खारिज
हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि, अवैधता या न्यायिक चूक नहीं है। इसलिए उसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। अदालत ने अपील को प्रारंभिक सुनवाई (एडमिशन स्टेज) पर ही खारिज करते हुए कहा कि केवल शादी नहीं होने के आधार पर हर लिव-इन रिलेशनशिप का मामला दुष्कर्म नहीं माना जा सकता।

















